यहाँ हर दिया बुझने पर मजबूर है,
और तुम रौशनी की दरकार करते हो,
खुदा के कैसे बंदे हो तुम जो,
हर सहरी पर इफ्तार करते हो.
वो वक़्त भी गुलाम था वो हुस्न भी कमाल था,
हर गली मे मचा बवाल था,
क्यूंकी मेरे शहर मे उसका ननिहाल था.
और तुम रौशनी की दरकार करते हो,
खुदा के कैसे बंदे हो तुम जो,
हर सहरी पर इफ्तार करते हो.
वो वक़्त भी गुलाम था वो हुस्न भी कमाल था,
हर गली मे मचा बवाल था,
क्यूंकी मेरे शहर मे उसका ननिहाल था.
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