Wednesday, 13 May 2015

रात में किसी परी का इंतज़ार हो जैसे

तेरे शहर का मिज़ाज़ देखा ,
 लोग बदनाम हैं एक नाम के खातिर। 

उन परिंदो के पैर अब तक भटकते है , 
शायद उनका आशियाना अब भी अधूरा है। 

 साँझ ढलते ही दिल में एक तलब सी जगती है , 
रात में किसी परी का इंतज़ार हो जैसे। 

तुम्हे आज़माने कि ख्वाहिश है तो किसी और से मिल , 
मेरे दिल के जज्बात अब खैरात नहीं रहे।

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