Monday, 6 July 2015

मै बलखाती हुई इठलाती हुइ

मैं चंचल मदमस्त हवा बेहती हूं
मै बलखाती हुई इठलाती हुइ
लहराती हुई मुझको क्या रोक
कोई गर्मी से व्याकुल खोलीपट रखती थी
खुद को छुपाती हुई घुसी अंगना बैठी
 दुल्हन छेर आइ बदन बेहकाती हुई
मैं चंचल………
वो सुथरी सुथरी घूमती थी
जुल्फो पे हाथ फिराती हुई
योवन पे गुमा कर के अक्सर
वो चलती थी इतराती हुई
मुझको न जची लो मैं तो
चली अपने संग धूल उराती हुई
भागी सरपत वो घर भीतर
 बड़ी चलती थी इतराती हुई
मैं……….
संध्या भ्रमण निकला चौधरी
मूछो पे ताव बांधे पगड़ी गरूर
की डोर से तने हुए बड़े हैं
धाख सब खड़े हुए पर मैने
तो करनी खिल्ली ले
आई पगड़ी उड़ाती हुई
मैं…….
खटिक बैठा था बगवानी मजाल
किसकी छू ले डाली अमुआ ललचाती
दिखती थी गुच्छो गुच्छो मे रस वाली
 मारी झोका गिरी अमुआ झकोर दी
कई डाली आया मजा मुझको
बड़ा बड़ा रखता था नजर चढाई हुई
मैं चंचल मदमस्त हवा मुझको
क्या रोक सकेगा कोई

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