Monday, 6 July 2015

मेरे गुनाहो का सिला मिलना जरुरी था

चलो अच्छा किया तुमने आए एक मोड़ से मुड़ कर
मेरे इस गम के सागर से तुझे उबरना जरूरी था
भला कब तक तुम्ही सहती रहती घुट घुट कर
मेरे मगरूर दामन को तुझे तजना जरूरी था
चलो………..
मै मगरूर कितना था अड़ज कागज के टुकड़ो को दिया
न मानकभी तुझको तेरे गृहणी सहारो को हुआ
एहसास मुझको अब गवा अनमोल दामन को मुझे
मेरे गुनाहो का सिला मिलना जरुरी था
चलो…….
कहा बदला है कुछ भी यहा वही घर है
वही अपने उतना ही कमाता हूं वही सोफे
गमले कभी आराम देते थे अभी हस्ते
मुझे चुभते मेरे मगरुर सीने मे कुछ टूटना जरुरी था
चलो……..
तुझे चाहता बहुत हूं दिलो जान से भी ज्यादा
 मै नदी की धारा तू थी मेरा किनारा बिखर रहा हूं
अब मैं बिन किनारा के सहारा लौट
कर आजा मेरी शांसे बिन रे साथ अधूरी है

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