अज्ञान मे ज्ञान खो गाया ,
तिमिर मे प्रकाश सो गया ।
हो चला विलुप्त सबकुछ ,
जब वन प्रदूषित हो गया ।
वो प्रातः की धूप अब
अंगारे लेकर आती है ।
और किरने उसकी जब
तन मन को जलाती है ।
और जलकर मन मेरा
सांझ को ताकने लगता है ।
और झुलस सा जाता है ।
वो शीतल पवन वो पीपल न
जाने कितने राहत के पल भूले
नहीं भुला पाती हूँ मैं घबरा सी जाती हूँ ।
परमेश्वर भी रोता है
देख हाल श्रीष्ठि का ।
खेद करो तुम इस विनाश
पर ये दोष नहीं दृष्ठि का ।
क्यो तुमने इस प्रकृति को
अपनी संपत्ति माना ।
जो देती शीतल छाया और
देती फल और अन्न का दाना ।
अपनी प्यास बुझाने तुमने
इनको प्यासा कर डाला ।
अब न कोई लता झूमती नहीं
भावरों की गुंजनबाला ।
जीवन का आकर्षण खोया
कुंठित ये मन हो गया ।
हो चला विलुप्त सब
कुछ जब वन प्रदूषित हो गया ।
तिमिर मे प्रकाश सो गया ।
हो चला विलुप्त सबकुछ ,
जब वन प्रदूषित हो गया ।
वो प्रातः की धूप अब
अंगारे लेकर आती है ।
और किरने उसकी जब
तन मन को जलाती है ।
और जलकर मन मेरा
सांझ को ताकने लगता है ।
और झुलस सा जाता है ।
वो शीतल पवन वो पीपल न
जाने कितने राहत के पल भूले
नहीं भुला पाती हूँ मैं घबरा सी जाती हूँ ।
परमेश्वर भी रोता है
देख हाल श्रीष्ठि का ।
खेद करो तुम इस विनाश
पर ये दोष नहीं दृष्ठि का ।
क्यो तुमने इस प्रकृति को
अपनी संपत्ति माना ।
जो देती शीतल छाया और
देती फल और अन्न का दाना ।
अपनी प्यास बुझाने तुमने
इनको प्यासा कर डाला ।
अब न कोई लता झूमती नहीं
भावरों की गुंजनबाला ।
जीवन का आकर्षण खोया
कुंठित ये मन हो गया ।
हो चला विलुप्त सब
कुछ जब वन प्रदूषित हो गया ।
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