Friday, 3 July 2015

आँखों की झुर्रियां कह देती है ,

मित्रो आपका स्वागत करती हूँ आज के इतने सम्मानीय विषय पर मैं अपनी एक सुंदर रचना आपके सामने लायी हूँ जिसमे मैंने अपने बचपन से लेकर व्रद्धावस्था तक का सफर तय किया अनुभव किया है । ये रचना हमारे सभी माननीय बड़े सदस्यों को समर्पित है , 
वृद्धावस्था
अल्हड्पन की सारी स्मृतियाँ,
सभी को गुदगुदाती होगी ।
महुओं और मक्कों सी ,
स्वाद में लुभाती होगी ।
गन्ने के रस में जब ,
शहद मिलके आता होगा ।
बालों में सफेदी से ,
मन चिढ़चिड़ता होगा ।
आँखों की झुर्रियां कह देती है ,
सारी खटास ।
खट्टी मीठी इमलियाँ ,
आम की मिठास ।
यादों में ठिठुरी ठंड में ,
फिर लौट आती है ,
बचपन की प्यास ।
जहां बर्फ ही बर्फ है ,
सेहरा की तरह ,
पर पानी नहीं ।
जहां बूढ़ा हो गया है
मन और तन पर जवानी नहीं ।

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