Friday, 3 July 2015

दूध की तरह उसने न जाने कितने

अपने पुरे वजूद के साथ
मेरे वजूद का हिस्सा वो मेरा है
और मैं उसकी अजीब सा है
हमारा गठजोड़ शायद गठजोड़ नहीं
हम घुल गए है एक दुसरे में मिश्री और
दूध की तरह उसने न जाने कितने
दुखो को मेरे सुखो में बदला है
 मेरी ख्वाहिशों को हक़ीकत में कभी
जो थोडा सा इधर उधर हुआ
भी अपनी तेज सांसो को भर कर
 होठों पर मुस्कान सजाये मैंने लिपटा लिया
अपने दामन में और हम फिर साथ साथ थे
मैं और मेरा विश्वास

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