Monday, 6 July 2015

मानव सेवा राष्ट्र सेवा हैं

मानव सेवा राष्ट्र सेवा हैं
विश्व सेवा हैं काम यही
सेवा को काम बनाया
जिसने उसका मिटता
कभी नाम नही अपने और
पराए मे जब अन्तर शेष नही होता
किसी जाती किसी धर्म का महत्व
विशेष नही होता
मानव………….
जब दूजे की खुशियो को मन
खुद से ही चल देता है
दूजे की दुखो से अपने
 मन को पीड़ा होता हैं
मानवता की सेवा को जब
 अन्दर से पुकार मिले सब
के खातिर सर्वस्व समर्पन करना
जब मन स्वीकार करे अहम की
काली छाया तब मन प्रवेश पाती ही नही
मानव……….
हर पल मन संतोष मे भीगा
पल पल हल्का लगता हैं
ये जीवन कृत्घन हुआ
आनन्द का झरना बहता हैं
इस झरना के आगे कभी
फिर क्रोध की लौ टिकती ही नही
संतोष से शान्त आन्नद मुग्ध
मन हींसा पे उतरी है कभी
मानव……….
सेवा भाव हैं औषधी एैसा जो
सारे दोष मिटाता हैं सब से
प्रेम को प्रेम से मन प्रेम मे बह जाता हैं
 इससे बड़ा न धर्म कोइ न कर्म
कोई न दीन कोइ जीवन पूर्ण
करने को हैं सिर्फ एक आधार यही
मानव…….

No comments:

Post a Comment