Thursday, 27 August 2015

धूल भरे उलझे बालों की चोटियां गूथती वो

आज गांव का बड़ा बरगद का वृक्ष
सूना है, उदास सा अकेला
कल तक जो उसकी गोद में
खेला करते थे, वे बच्चे
आज बड़े हो गये हैं

धूल भरे उलझे बालों की
चोटियां गूथती वो गुड़िया जैसी थी
और उसे मारता, दुलारता वो नन्हा
पर शैतान सा बच्चा

परदेश गए थे जब दोनों तो यहीं पर
अपने दोस्तों से मिलकर
फफक उठे थे सारे और फिर
वापस आने का वादा कर गए

उनकी राह देखते आज बरगद का पेड़
अपनी लटें बिछाए बैठा है पर
उसकी जवानी के दिनों के बच्चे
जवान हो गए है, फिक्र में खो गए हैं

अब उनकी दुनिया
बहुत बड़ी हो चुकी है
शायद बरगद से भी बड़ी जहां,
खेलकर वे बड़े हुए थे

और जर्जर होता वृक्ष इस आस में 
किसी दिन ढह जाएगा कि 
शायद वापस आकर कभी परदेश से 
यहां तक पहुंचेंगे उसकी आंखों के तारे

मां हर मुश्किल से हमें बचाया तुमने

मेरे बचपन के गीतों में
तुम लोरी और कहानी में
तुम मुझमें हर पल हंसती हो
मैं तेरी जैसी ही दिखती हूं

वो दिन जब तुम मुझको ओ मां
गलती पर डांटा करती थी
फिर चुप जाकर कमरे में उस
खुद ही रोया करती थी मां

तुम पहला अक्षर जीवन का
तुम मेरे जीवन की गति हो
खुली आंखों का सुंदर स्वप्न
दुनिया में मेरी शीतल बयार

 मैं तेरी छाया हूं देखो
तेरे जैसी ही चलती हूं
तेरे जैसी ही भावुक हूं
तुम जैसी ही रो देती हूं

अपने आंचल की ओट में मां
हर मुश्किल से हमें बचाया तुमने
औरत होने का दंश झेलकर
अभागन कहलाकर

मेरी आजादियों पाबंदियों 
और दहलीजों में तुम हो पर मां,
नहीं पूजूंगी तुम्हारी तरह जीवन भर 
किसी पत्थर दिल को अपना राम बनाकर

कुएं का पानी हर मौसम में

गांव की झोपड़ियों के बीच
एक कुएं का पानी हर मौसम में
सबकी प्यास बुझाता है
तृप्त चेहरे देख, विचित्र संतोष उसमें ‘जीवन’ भर देता है।

लगभग न दिखने वाले अस्तित्व में भी
अपनी सूखती धमनियों से
निचोड़ कर तमाम जलराशि
उस गांव की छोटी-छोटी बाल्टियों में भर देता है

कुएं की डाबरों में सिमटी जलराशि ने
जैसे कर लिया हो गठबंधन
धरती की अथाह जलराशि से
कि वो सूखकर भी खाली नहीं हुआ है

गांव के घरों की ढिबरी की रोशनी
नहींं पहुंचती उसके अंधेरे वर्तमान तक
लेकिन वह हर दिन सूखते हुए भी
सींच रहा है सैकड़ों जीवन

कोई अभिलाषा शेष नहीं है
उम्मीद कोई पैदा नहीं होनी है अब
उसे मालूम है अपना अंजाम पर उससे पहले 
वह निभा रहा है कर्त्तव्य धरती पर ‘जीवन’ कहलाने का

मेरे बाबा मुझे ब्याहना चाहते हो

मेरे बाबा मुझे ब्याहना चाहते हो
खुद से दूर भेजना चाहते हो
अपने आंगन की लाडली को
किसी को सौंप देना चाहते हो

मेरे प्यारे बाबा ऐसा वर ढूंढो
जो मेरा हाथ थामकर चले
सात जन्मों के बंधन नहीं मानती मैं
पर यह जन्म उसका और मेरा साझा हो

मेरे हिस्से की धूप-छांव
साथ खड़े रहकर महसूस करे
पर ऐसे वर से मत मांधना बंधन मेरा
जो किसी के साथ कभी खड़ा ही न हुआ हो

जो अपनी शान और अस्तित्व को
थोपकर मुझे जड़ कर दे
मत देना मेरा हाथ उसके हाथों में
जो मेरी सरलता को ब्याहकर खरीद ले

जो प्रेम का मतलब न जानता हो
उससे प्रीति का संबंध मत लगाना मेरा
कि कुंद कर दे वो मेरे भीतर की स्त्री का हृदय
कठोरता के लबादे से ढंक दे कि मैं उस जैसी ‘सभ्य’ दिखूं

मेरी चंचलता को अपमान कह दे
जो मेरी शरारतें जिसके समाज में असभ्य लगें
मत ब्याहना ऐसे महलों में रहने वाले से
जो आपकी परवरिश का उपहास करे

छोटी-छोटी खुशियां बटोर कर
आंचल मैं फैला दूं तो भर दे जो
चांद-सितारों की चाहत नहीं मुझको
ब्याहना उससे जिसकी आंखों में नींद न आए मेरे रो देने पर

वर वही खोजना बाबा
जो मेरा देवता बनने को दबिश न दे
मेरा आधा हिस्सा बनकर जिए मुझमें
कि उसके या मेरे प्रेम पर ‘हमारा’ हक हो

चली जाऊंगी उससे ब्याह करके
जो मुझे मेरे हिस्से के आकाश को चूमने दे 
जो बांट ले मेरे जनम भर की रातें-दिन, सुख-दुख 
मेरे जीवन के शब्दकोश से मिटा दे अकेलापन 
बाबा ऐसा वर ढूंढो।

Wednesday, 26 August 2015

मां छांव तो पिता वो बरगद का पेड़ हैं

मां अतुल्य है जीवन की साक्षी है
लेकिन पिता बिना मां की परिभाषा कहां बन पाती
मां छांव तो पिता वो बरगद का पेड़ हैं
जिसकी छत्रछाया में मां हमें पालती है
 
मेरे पिता, बचपन में आपकी फटकार के संग
मैंने आपका दिल धड़कते महसूस किया है
पर मां की डांट के बाद आपका प्यार
मन के कोनों में प्रकाश भरता रहा है

आप हैंं तो जीवन सुंदरतम है
आपके होने से ही आंखों में इतने रंग हैं
आपका होना ही मेरा खुद पर विश्वास है
मेरे जीवन के कल्पतरु हैं आप पिता

जीवन के तमाम विषाद पीकर
हर दर्द को अपने सीने में समेटकर
 आपने दी हर मुश्किल को चुनौती
कि आज मेरी सफलताएं आपसे ही हैं

मेरी उपलब्धियों पर मुस्कुराते आप
मेरी विफलताओं पर अब कुछ नहीं कहते
नहीं, इतना बड़ा तो नहीं होना था मुझे
आप ही मेरे नायक हो, कुछ सवाल तो किया करो

आपका कुनबा बढ़ रहा है लेकिन
इस वटवृक्ष की जड़ें आप ही हो
कि आपकी गोद में सिर रखकर
अब भी वक्त बिताना अच्छा लगता है,

जी चाहता है तोड़ दूं दीवार घड़ी की सुइयां
कि आप बूढ़े नहीं हो सकते कभी
आपकी निरंतरता मेरी रगों में है
मैं दुनिया में आपका ही प्रतिरूप हूं,

आपके होने से ही मैं हूं पिता
आपका कभी न होना कल्पना से भी परे है
इन आंखों में सपने भरने वाले पिता
मैंने आपके बिना दुनिया सोची नहीं अब तक

मेरे मन के जीवट योद्धा 
जागो कि तुम ढले नहीं, बस थक गए हो 
मैं हूं तुम्हारी आत्मशक्ति देखो मुझे 
तुम्हारी आत्मा का अंश हूं, मुझमें जवान होते पिता

तुम्हारी परछार्इं को कैद कर लेना चाहती हूं

दिन भर की थकान के बाद
सूरज जब ढलने लगता है
उसकी सुनहरी रश्मियों से टकराकर बनने वाली
तुम्हारी परछार्इं को कैद कर लेना चाहती हूं

छत की मुंडेर पर खड़ी रहकर अनवरत
उस परछार्इं को जाते हर दिन देखती हूं
जो तुम्हारे लौटने के साथ-साथ
मुझसे दूर होती चली जाती है

हर दिन तुम्हें छूकर आने वाली
इन किरणों को आंखों से स्पर्श करती हूं
जैसे तुम्हारे और मेरे दरमियान
स्रेह का अस्तित्व बस इन्हीं से है

मेरी पहुंच से दूर रहकर भी
तुम मुझे रोज छूकर गुजर जाते हो
और तुम्हारी रोशन छवि निहारकर
मेरा मन प्रकाश से भर जाता है

 मेरे छज्जे से तुम्हारे छज्जे के कोने तक
ये दूरी जैसे जनम भर की हो पर
रोज तुम्हारे ओझल होने से पहले
मन की मखमली कैनवास पर
तुम्हारी तस्वीर उतार लेती हूं

ये फासले कब तक रहें कुछ पता नहीं लेकिन 
तुम्हारे प्रेम के उजाले से मेरा अस्तित्व जगमगा उठा है 
और देखो यह रोशनी हमारे मिलन की 
मौन रहकर इस रात को सवेरा बना रही है।

आपकी उंगली उस सहारे की तरह है पापा

मेरे जीवन ग्रंथ, मेरे कर्मयोगी पिता
आपके लिए आज का एक दिन तो क्या
जीवन भर जश्न मनाऊं तो कम है
कि आपके रूप में ईश्वर का हाथ मेरे सिर पर है

आप वेदों की पवित्रता हो मेरे लिए
जिसमें सजी हैं मेरे पुरखों की परिचय ऋचाएं
आपकी आंखों में साक्षात वह ब्रह्म है
जो पीड़ाओं का पहाड़ ढोकर भी उफ नहीं करता

आप मेरे साथ हैं तो तीनों लोक, चौहदों भुवन मेरे हैं
आप हंसते हैं तो जीवन में मुस्कुराहट बिखर जाती है
आपकी मौजूदगी है तो सुंदर हेमंत और बसंत क्या
चारों दिशाएं, आठो ऋतुएं मेरी बाहों में होती हैं

आप नाराज हो जाएं तो ऐसा लगता है
जीवन के आकाश पर बिजली कड़क उठी हो
अस्तित्व की बुनियाद कमजोर लगने लगती है
आपके टूटने से मेरी उम्मीदें जैसे परास्त होने लगती हैं

आपकी उंगली उस सहारे की तरह है पापा 
जिसके दम पर मेरा जीवन सार्थक होता है 
सचमुच पिता जीवन के हर लम्हे में शामिल हैं आप 
और मां तुम उस हर लम्हे की सुंदर साक्षी हो।

औरत का नाम जेहन में आते ही

औरत का नाम जेहन में आते ही
एक कोमल आकर्षक काया
आंखों के सामने सजीव हो उठती है
जिसका भाग्य ही जैसे उसकी सुंदरता हो

कवियों ने उसे हिरनी सा बताया
तो चित्रकारों ने प्रकृति सा मनोरम
गीतों में वह झरने की कल-कल है
तो स्वर में कोयल से भी मीठी

किसी का जीवन सार बनकर मन में बसाई गई
तो किसी की प्रेयसी बनकर प्रेम के उपमानों से सजाई गई
पर इनमें से कभी किसी रूप में क्या
उसकी सुंदरता से हटकर कुछ वंदनीय हो सका

वह कुरूप रहकर कब प्रेम की पात्र बनी
उसके सुंदर अंतस को किसी ने यूं सराहा क्या
इस समाज में जब तक वह खूबसूरत है
शायद हर गजल, हर गीत की जरूरत है

स्त्री चित्रण उसके लावण्य के बिना अधूरा लगता
है क्या सफलता है यह औरत की, जिस पर वह इतराती रही
या उसे सौन्दर्य के पाश में बांध, प्रेम के आडंबर से घेर
साजो-सामान बनाने के पीछे की साजिश

विडम्बना ही है कि जीवन के हर रूप में शामिल होकर भी 
वह मानव या प्रकृति तुल्य कम सराही, अपनाई गई 
उसका तेज, उसकी ममता, उसका त्याग या प्रेम नहीं 
उसकी मनोहरता ही उसके होने को साबित करती रही

होठों पर लाली, माथे पर बिंदी सजाये

दुनिया के भगवान कहे जाने वाले सूरज का
इस तंग जगह से कोई वास्ता नहीं रहता
नहीं डालता कभी रोशनी इन अंधेरी गलियों पर
कि वो भी शुचिता की परंपरा को तोड़ नहीं सकता

होठों पर लाली, माथे पर बिंदी सजाये
कतार में खड़ी ये सुहागिनें नहीं
पति नहीं उन्हें तो ‘किसी का भी’ इंतजार है
जो नीलामी की गली में उनकी भी बोली लगाएगा

हर दिन की कमाई या पूंजी कह लो
जिस्म की ताजगी पर ही जीवन का दारोमदार है
‘सभ्य’ लोगों की वासना को मिटाती हर रोज
हवस की ड्योढ़ी पर कुर्बान होना ही नियति है उनकी

श्मसान से भी ज्यादा लाशें
इन बदनाम गलियों में ‘जिंदा’ हैं
इनकी मौत या जिंदगी दोनों ही क्योंकि
कभी तरक्कीपसंद समाज में अहमियत नहीं रखती

सपने देखना ‘काम’ की पाकीजगी पर सवाल है
आजादी का मतलब माग लेना मौत है
उसका हक है कि वह परोसी जाए
और अधिकार है उसके ‘गोश्त’ की अच्छी कीमत

मौत से खौफ नहीं उसे लेकिन
पल-पल मरकर जिंदा रहने से डरती है
बेशर्म होने का नाटक करते-करते 
लजाने की खूबी चुक गई कब की 

पत्नी, बहन, बेटी और मां इनका पर्याय 
वह जानती है लेकिन वह इनमें से नहीं 
क्योंकि अनमोल हैं ये और उसकी 
तो हर दिन कीमत चुका दी जाती है...

स्त्री तुम सचमुच अद्भुत हो

स्वाहा तुम्हीं स्वधा तुम हो 
तुम कल्याणी सृष्टि की 
बन मोहिनी जग को 
रचती स्त्री तुम सचमुच 

अद्भुत हो एक बदन एक
ही जीवन पर इतने रूपों
में जीवित हो सबसे पावन
प्रेम तुम्हारा स्त्री तुम 

सचमुच अद्भुत हो अन्नपूर्णा 
इस जग ही तुम ही क्षुधा मिटाती हो
 प्रेम भरा हर रूप तुम्हारा 
स्त्री तुम सचमुच अद्भुत हो

पावन गंगा सी निर्मल हो 
को सिंचित, पोषित करती
 तुम न हो तो जग न होगा
स्त्री तुम सचमुच अद्भुत हो

कान्हा मैं तुम संग दिन भर डोलूंगी

सुन लो कान्हा मेरे कान्हा 
मैं सखियों संग न जाऊंगी 
मैं तुम संग दिन भर डोलूंगी 
देखो कान्हा मेरे कान्हा 

जब रास रचाई थी तुमने 
मैं तन-मन भूल चुकी थी 
सच तुम भोले-भाले चंचल 
से मोहक चितवन, आमंत्रण से 

मुरली मधुर बजा कान्हा 
नित लीला नई दिखाते हो 
मैं हुई प्रेम में दीवानी तुम क्यों 
ना प्रीति लगाते हो मैं वारी जाऊं 

तुम पर जो तुम ज्यादा ही 
इतराते हो मैं चोरी कर लूंगी 
तुमको मटके में धर लूंगी
तुमको खोलूं मटका देखूं 

तुमको इस मटके में रह
 जाओगे मेरे कान्हा 
प्यारे कान्हा देखो कान्हा,
 सुन लो कान्हा

आंखों में बाजरे से हरे सपने लिए

इस गांव की हवेलियों के पीछे
एक चमारों की बस्ती है
रहती हैं जहां मुनिया, राजदेई और जुगुरी
अपनी चहक से मिटाती हैं गरीबी का दंश

 ये उन चमारों की बेटियां है
जिनके मजबूत हाथ और बलिष्ठ शरीर
जमींदारों के खेत में हरियाली बोते हैं
लोगों का पेट भरते हैं अन्नदाता हैं हमारे

भयानक ठंड और चिलचिलाती धूप में
ये लोग खेतों में गीत गाते हैं
अनाज के सैकड़ो बोरे पैदा करने के बदले
कई रातें फांका करके सोने को विवश हैं

फिर भी अपने कर्त्तव्य की तपिश में
भूखे पेट भी ठाकुरों की बेगारी करते हैं
उनके लठैतों और लाडलों का
आंखों में खौफ दिन-रात रहता है

पशुओं की चरी और बरसीम सिर पर लिए
हाथ में टांगे कंडियों की टोकरी
एक दिन अपनी धुन में चली आती थी मुनिया
आंखों में बाजरे से हरे सपने लिए

क्या पता था उस बालिका को
कोई भेड़िया है घात में
उसकी कोमलता को शापित करने को
किसी जानवर ने झपट्टा मारा था

दर्द से बिलबिलाती मुनिया की
 तड़पती चीखें दबती गर्इं,
थमती गर्इं उसके विरोध से घायल भेड़िये के पंजों ने
मुनिया से जीने का हक भी छीन लिया

कल तक आंगन में फुदकती मुनिया
नि:शब्द हो गई, गहरी नींद सो गई
बाप की लाडली, मां की प्यारी बेटी
निर्मम दुनिया को अलविदा कह गई

मुनिया की लाश लिए खड़ा था बाप उसका
ठाकुरों के बेटे बन्दूक लहराते पहुंच आए थे बस्ती में
बोले दफन करो चमारों अपनी औलाद को
इस ‘सभ्य’ गांव में पुलिस नहीं आने पाए

कलेजे के टुकड़े को गोद में लिए
बाप की आंखें इंतजार में सूखी जा रही थीं
थाने में रपट लिखाए दिन बीत गया लेकिन
कोई ‘कानून का रखवाला’ बस्ती में नहीं पहुंचा

पता चला कि ‘हवेली’ में आज 
शराब का दौर ‘साहब’ लोगों के लिए चल रहा है
इधर चमारों की पूरी बस्ती में 
एक भी चूल्हा नहीं जल रहा है 

तब उस मजबूर बाप ने अपनी मुनिया 
को ढेलों के बीच एक गड्ढे में दफना दिया 
और ठाकुरों के अय्याश लाडलों 
की पंचायत में पेशी को चल दिया।

जहां गुड़िया - गुड्डे की शादी थी

वो बचपन का जमाना था 
जो दुनिया से बेगाना था 
जहां गुड़िया की शादी थी 
जहां गुड्डे का गाना था 

कभी अंताक्षरी के दिन
कभी चौपाल सजती थी 
गुलाबी दिन हुआ करते
गुलाबी रात लगती थी 

जेबों में कुछ आने थे 
मगर मेले सुहाने थे 
वो बाइस्कोप अच्छे थे 
डंडा गिल्ली पे ताने थे 

चवन्नी की बरफ मिलती 
अठन्नी की मिठाई थी 
वो खुशियों से भरे दिन थे 
भले ही कम कमाई थी 

ऊदल की वो गाथा थी 
जो दादी तब सुनाती थीं
आल्हा के पराक्रम 
के नानी गीत गाती थीं 

एक टांग के सब खेल 
महंगे खेलों से अच्छे थे 
इस आलीशान यौवन से 
वो बेफिकर दिन ही अच्छे थे 

वो दोहे, गीत वो सारे जो 
हम बचपन में गाते थे 
 वो बातें, मस्तियां सारी
जहां गम भूल जाते थे 

कोई वापस दिला दे आज 
जो बचपन के जमाने थे 
जहां हर पल में जादू था 
जब हम सब दीवाने थे

तेरा अक्स तैरता है, आंखों में दर्द बनकर

तेरे साथ हमकदम थे, तेरे लिए सनम थे
तुझसे थी मेरी हस्ती, तेरे बिना ना हम थे 

तेरे साथ ही चले हम, तेरे लिए ठहर गए 
दिल में कसक लिए हम बेसाख्ता बिखर गए

कहते थे तेरा जाना जाएगा, जाएगा भूल दिल 
ये तूं दूर हो भले ही, तेरी याद में संवर गए 

इश्क का गुबार-ए-ख्वाब था, कल था अभी नहीं है 
तुम भी कहीं थे टूटे, हम भी कहीं बिखर गए

तेरा अक्स तैरता है, आंखों में दर्द बनकर 
तेरे लिए थे जिंदा, तेरे लिए ही मर गए

मेरी हसरतों को इश्क का गुलाम कर गया

दर्द-ए-दिल हर सुबह हर शाम दे गया 
वो चंद मुलाकातों में अपना नाम दे गया 

हम तो थे बेफिकर मौजों में थी 
नजर मुस्कुराकर मुहब्बत का इंतकाम ले गया 

कल तक हो जो भी चाहत अब वो ही रह गया 
मेरी हसरतों को इश्क का गुलाम कर गया 

बसने लगा है आज धड़कनों की जगह 
वो जीने की वजह मुझको वो तमाम दे गया

दिल के जख्मों को ठहाकों में न छुपा पाऊं।

क्यों चाहकर भी तेरी याद न भुला पाऊं।
दिल के जख्मों को ठहाकों में न छुपा पाऊं।
आंसू बन के तेरी यादें बरसती जाती हैं,
तेरी जैसी संगदिल क्यों न बन पाऊं ।
अपना जी भर के बिजलियां तूं गिरा ले मुझ पे,
इससे पहले कि मैं लंबे सफर निकल जाऊं।
मेरी सांसों ने भी तो मुझसे बेवफाई की,
तेरी चाहत की तरह कब पता बिखर जाऊं।
अभी सोचा था कि सूरत तेरी न देखूंगी,
डर क्यों लगता है देखे बिना न मर जाऊं।
रेत के महलों में पलते ये सपने मेरे क्यों,
 एक अदनी सी लहर आये और मैं बह जाऊं।

मन में आह उपजाती,वेदना का कहर


मन में आह उपजाती,वेदना का कहर
अविरल उच्छवासों में
समेट कर छुपाती हूं।

अटकती सांसें
आत्मा को चीरकर,
आंसुओं के दामन में
लुढ़क जाती हैं।

पीड़ा की कठोरता
 मुझमें  टूटकर तब,
भावनाओं को लिये
आंखों में पिघल जाती है।

उलझनों की लहरों को
जीवन के आह्लादों पर,
ठोकरें मारने से
कहां रोक पाती हूं।

Monday, 24 August 2015

लब से लबों की पहली मुलाकात लिखी थी |

शाम और सवेरा मैंने दिन औ रात लिखी थी,
ख़त में रूमानी प्यार की इक बात लिखी थी |
इक हाथ में अलफ़ाज़-ए-दिल इक हाथ में कलम 
लब से लबों की पहली मुलाकात लिखी थी | 
ताउम्र इबारत सी निभाती रही उसे , 
चाहत ने जिस्म-ओ-रू पे वो सौगात लिखी थी | 
इस पहलू मुहब्बत रही उस पहलू खुदाई, 
आशिक की जुबां ज़ीस्त की औकात लिखी थी |
यादों की शाख पर वो गुल जवां है मुसलसल ,
इतनी वफ़ा से तूने जो बरसात लिखी थी | 
रुखसार माहताबी थे सूरत कोई कंवल, 
उस रहनुमाई ने भी करामात लिखी थी | 
मेरा हमराह भी है वो वही मेरी कही ग़ज़ल, 
हर सू उसे ही सूरत-ए-हालात लिखी थी |

दो भीगे मन सुलगते रहते हैं बारिश की बूंदों से

किसी की आह धड़की थी कि अब धड़कन नहीं जाती , 
उन्हीं भीगे लबों की नरमी है सिहरन नहीं जाती | 
दो भीगे मन सुलगते रहते हैं बारिश की बूंदों से , 
कहीं ख्वाहिश अधूरी है कहीं तड़पन नहीं जाती |

मेरी रूसवाईयों को धो रहा है।

फलक पर फिर उजाला हो रहा है, 
चाँद बाहों में छुपकर सो रहा है। 
किसी मासूम बच्चे सा लगा वो, 
मेरे पहलू में जैसे रो रहा है। 
वो क्यारी की कतारों से उठाकर, 
मिरे आंचल में खुशबू बो रहा है। 
दिवानी बदलियों सा वो बरसकर, 
मेरी रूसवाईयों को धो रहा है। 
सफर में ज़िंदगी के दर्द को भी, 
वो असबाबों के जैसे ढो रहा है। 
उसी पागल को मैंने पा लिया है, 
जिसे लगता है मुझको खो रहा है। 

 
                                                                                                                                  .कनुप्रिया

रात भर जागती रहती है,

ख्वाब आँखों में जगाकर के, सुला देता है|
खूब रोती है नज़र प्यार, भुला देता है |
वो परिंदे सहम गए हैं अब, नहीं आते |
कि ये इंसान है, ज़ेहराब पिला देता है |
ये मुहब्बत यकीन भी तो, बदगुमानी भी |
दिल डराता है तो चेहरा भी खिला देता है |
दोस्ती हासिल-ए-ईमान, ज़िंदगी का सबक |
कहीं कान्हा को सुदामा से, मिला देता है |
फूँक देता है ये तेज़ाब, मुहब्बत का मगर |
चाह मिलती है तो चाहों का, सिला देता है |
रात भर जागती रहती है, कलेजे में जलन यही तूफान चरागों को, जला देता है |


..कनुप्रिया

धड़कनों से कभी फरियाद तो, करती होगी।

शब-ए-फ़ुरक़त में सवालात तो, करती होगी ।
धड़कनों से कभी फरियाद तो, करती होगी।
रूठ जाती थी जो तनहाई में, अकसर तुझसे । 
तेरी यादें भी मुझे याद तो , करती होगी।

आदमी आदमी से जलता है..!

चंद लाइनें बहुत ही खूबसूरत अगर आप तक पहुँच सकें....। 
फजूल ही पत्थर रगङ कर आदमी ने चिंगारी की खोज की,
अब तो आदमी आदमी से जलता है..! 
मैने बहुत से ईन्सान देखे हैं,
जिनके बदन पर लिबास नही होता।
और बहुत से लिबास देखे हैं,
जिनके अंदर ईन्सान नही होता।
कोई हालात नहीं समझता ,
कोई जज़्बात नहीं समझता ,
ये तो बस अपनी अपनी समझकी बात है..., 
कोई कोरा कागज़ भी पढ़ लेता है,
तो कोई पूरी किताब नहीं समझता!!
"चंद फासला जरूर रखिए हर रिश्ते के दरमियान! 
क्योंकि"नहीं भूलती दो चीज़ें चाहे जितना भुलाओ....!.....
एक "घाव"और दूसरा "लगाव"...

Sunday, 16 August 2015

गांव का बड़ा बरगद का वृक्ष

आज गांव का बड़ा बरगद का वृक्ष
सूना है, उदास सा अकेला
कल तक जो उसकी गोद में
खेला करते थे, वे बच्चे
आज बड़े हो गये हैं

धूल भरे उलझे बालों की
चोटियां गूथती वो गुड़िया जैसी थी
और उसे मारता, दुलारता वो
नन्हा पर शैतान सा बच्चा

परदेश गए थे जब दोनों तो यहीं पर
अपने दोस्तों से मिलकर
फफक उठे थे सारे और फिर
वापस आने का वादा कर गए

उनकी राह देखते आज बरगद का पेड़
अपनी लटें बिछाए बैठा है पर
उसकी जवानी के दिनों के बच्चे
जवान हो गए है, फिक्र में खो गए हैं

अब उनकी दुनिया
बहुत बड़ी हो चुकी है
शायद बरगद से भी बड़ी जहां,
खेलकर वे बड़े हुए थे

और जर्जर होता वृक्ष इस आस में 
किसी दिन ढह जाएगा कि 
शायद वापस आकर कभी परदेश से 
यहां तक पहुंचेंगे उसकी आंखों के तारे

मां मैं तेरी जैसी ही दिखती हूं

मेरे बचपन के गीतों में
तुम लोरी और कहानी में
तुम मुझमें हर पल हंसती हो
मैं तेरी जैसी ही दिखती हूं

वो दिन जब तुम मुझको ओ मां
गलती पर डांटा करती थी
फिर चुप जाकर कमरे में उस
खुद ही रोया करती थी मां

तुम पहला अक्षर जीवन का
तुम मेरे जीवन की गति हो
खुली आंखों का सुंदर स्वप्न
दुनिया में मेरी शीतल बयार

मैं तेरी छाया हूं देखो
तेरे जैसी ही चलती हूं
तेरे जैसी ही भावुक हूं
तुम जैसी ही रो देती हूं

अपने आंचल की ओट में मां
हर मुश्किल से हमें बचाया तुमने
औरत होने का दंश झेलकर
अभागन कहलाकर

मेरी आजादियों पाबंदियों 
और दहलीजों में तुम हो पर मां, 
नहीं पूजूंगी तुम्हारी तरह जीवन भर 
किसी पत्थर दिल को अपना राम बनाकर

गुलाम बनकर जिओगे तो

गुलाम बनकर जिओगे तो.
कुत्ता समजकर लात मारेगी तुम्हे ये दुनिया
नवाब बनकर जिओगे तो, 
सलाम ठोकेगी ये दुनिया…. 
“दम” कपड़ो में नहीं, जिगर में रखो…. 
बात अगर कपड़ो में होती तो, सफ़ेद कफ़न में, 
लिपटा हुआ मुर्दा भी “सुल्तान मिर्ज़ा” होता.

अब बहू हो चुकी है वह अल्हड सी लड़की

वह अल्हड सी लड़की अब बहू हो चुकी है

नर्म हाथों से वह रोटियां उठा लेती है
जिसे चिमटे से छूने में भी डरती थी
बाबा की राजकुमारी
अब पति के इशारों पर चलती है

चावल से कंकड़ों को बीनती
सिल-बट्टे पर मसाले पीसती
माथे पर आए पसीने को पोंछती
मुस्कुराती है हर आदेश पर

किसी का खाना किसी का बिछौना
किसी का पानी किसी का दाना लिए
दिन-रात घर में डोलती
आमदनी और खर्चे को जोड़ती

हर पल फुदकती, चहकती वो लड़की
सहनशील, संस्कारी बन गई है
बोलना मना है उसे किसी के बीच
अपनी राय लिए सो जाती है हर रात

सुबह शाम तो होती है रोज पर
रोटियों को गोल-गोल घुमाते
बच्चों के टिफिन लगाते
झूठे बर्तन मांजते निकल जाती है

वह हंसती है क्योंकि
उसके पति और बच्चे खुश हैं
उसकी खुशी के मायने बदल जो चुके हैं
वह अपने लिए नहीं उनके लिए खुश होती है 

वह भूल चुकी है कि चारदीवारी से बाहर
दुनिया कैसी दिखती है, सुबह कैसी लगती है 
वह भूल चुकी है अपना अस्तित्व, अपनी पहचान
उसे नहीं कहलाना बाबा की गुड़िया या मां की बिटिया 

वह अल्हड़ सी लड़की अब बहू हो चुकी है।

सबकी प्यास बुझाता है कुएं का पानी

गांव की झोपड़ियों के बीच
एक कुएं का पानी हर मौसम में
सबकी प्यास बुझाता है तृप्त चेहरे देख,
विचित्र संतोष उसमें ‘जीवन’ भर देता है।

लगभग न दिखने वाले अस्तित्व में भी
अपनी सूखती धमनियों से
निचोड़ कर तमाम जलराशि
उस गांव की छोटी-छोटी बाल्टियों में भर देता है

कुएं की डाबरों में सिमटी जलराशि ने
जैसे कर लिया हो गठबंधन
धरती की अथाह जलराशि से 
कि वो सूखकर भी खाली नहीं हुआ है 

गांव के घरों की ढिबरी की रोशनी
नहींं पहुंचती उसके अंधेरे वर्तमान तक 
लेकिन वह हर दिन सूखते हुए भी 
सींच रहा है सैकड़ों जीवन 

कोई अभिलाषा शेष नहीं है 
उम्मीद कोई पैदा नहीं होनी है अब 
उसे मालूम है अपना अंजाम पर उससे पहले 
वह निभा रहा है कर्त्तव्य धरती पर ‘जीवन’ कहलाने का

बाबा मुझे ब्याहना चाहते हो

मेरे बाबा मुझे ब्याहना चाहते हो
खुद से दूर भेजना चाहते हो
अपने आंगन की लाडली को
किसी को सौंप देना चाहते हो

मेरे प्यारे बाबा ऐसा वर ढूंढो
जो मेरा हाथ थामकर चले
सात जन्मों के बंधन नहीं मानती मैं
पर यह जन्म उसका और मेरा साझा हो

मेरे हिस्से की धूप-छांव
साथ खड़े रहकर महसूस करे
पर ऐसे वर से मत मांधना बंधन मेरा
जो किसी के साथ कभी खड़ा ही न हुआ हो

जो अपनी शान और अस्तित्व को
थोपकर मुझे जड़ कर दे
मत देना मेरा हाथ उसके हाथों में
जो मेरी सरलता को ब्याहकर खरीद ले

जो प्रेम का मतलब न जानता हो
उससे प्रीति का संबंध मत लगाना मेरा
कि कुंद कर दे वो मेरे भीतर की स्त्री का हृदय
कठोरता के लबादे से ढंक दे कि मैं उस जैसी ‘सभ्य’ दिखूं

मेरी चंचलता को अपमान कह दे जो
मेरी शरारतें जिसके समाज में असभ्य लगें
मत ब्याहना ऐसे महलों में रहने वाले से
जो आपकी परवरिश का उपहास करे

छोटी-छोटी खुशियां बटोर कर
आंचल मैं फैला दूं तो भर दे जो
चांद-सितारों की चाहत नहीं मुझको
ब्याहना उससे जिसकी आंखों में नींद न आए मेरे रो देने पर

वर वही खोजना बाबा
जो मेरा देवता बनने को दबिश न दे
मेरा आधा हिस्सा बनकर जिए मुझमें
कि उसके या मेरे प्रेम पर ‘हमारा’ हक हो

चली जाऊंगी उससे ब्याह करके 
जो मुझे मेरे हिस्से के आकाश को चूमने दे
जो बांट ले मेरे जनम भर की रातें-दिन, सुख-दुख 
मेरे जीवन के शब्दकोश से मिटा दे अकेलापन 
बाबा ऐसा वर ढूंढो।

Saturday, 15 August 2015

जिन्दगी मेँ नम्बरोँ का चक्कर बुरा है।

नम्बरोँ का चक्कर है बुरा.... 
जिन्दगी मेँ नम्बरोँ का चक्कर बुरा है। चाहे वो परीक्षाफल के नम्बर हो या अंगवस्त्र का नम्बर या आई.पी.सी का नम्बर। आज मसान फिल्म देखी थी। एक पिल्ला टाइप दरोगा था, जो एक कपल को होटल मेँ पकड़ लेता है। जिसके चलते लड़का ऑन स्पॉट आत्महत्या कर लेता है और लड़की तथा उसके पिता से ब्लैकमेल करके पैसे ऐठता है। इसके साथ एक लोअर कास्ट और अपर कास्ट की प्रेम कहानी भी चलती है। अजीब बात है, डोम जो अपर कास्ट के शव को ससम्मान दाह करते है वो नीची जाति के है। अगर ऊँची जाति के शव को चील कौए खाँ जाते तब? खैर पुलिस और समाज कपल के प्रति कितना घटिया रवैया रखते है ये बात तो इस पिच्चर से पता ही चल गयी। भारत मेँ संभोग करने की आजादी भले ही कानून दे देँ पर पुलिस दलाल बनकर ब्लैकमेल करने पहुँच जाती है। इधर समाज के कुछ कुंठित लोग इसी आदर्श मेँ जीते है कि जहाँ प्यार है वहाँ संभोग नही। हिन्दी भाषी हमारा भारतवर्ष को यही नही पता कि प्रेम क्या है, वासना क्या है और संभोग क्या है। मजे की बात ये है कि जो चीज नागरिको को अधिकार के रुप मेँ मिली है, उसका प्रवर्तन न होकर जबरन अधिकारो से वंचित किया जाता है। पर जफ हत्या बलात्कार डकैती हो जाये तो पुलिस को सांप सूंघ जाता है। एक बात मैँ आपको साफ कर दू कि अगर आपको कोई पुलिस वाला या वाली ब्लैकमेल करे कि आप किसी पुरुष या स्त्री के साथ सम्बन्धोँ मेँ है तो आप कतई ब्लैकमेल न हो। कानून के सामने किसी की औकात नही है। बेशक थोड़ा लड़ना पड़ता है। पर बाद मेँ डी.जी.पी हो या एस.पी या मंत्री सभी लोग जेल मेँ चक्की पीसते है। आप अगर किसी पुलिसवाले या वाली से परेशान है तो आप न्यायालय मेँ मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट के यहाँ परिवाद दाखिल कर सकते है और उच्च न्यायालय मेँ मौलिक अधिकारो के हनन के तहत रिट दाखिल कर सकते है। शरीफ आदमी नंगा नही होना चाहता पर अगर उसे नंगा करोगे तो वो आपका क्या हश्र करेगा आपको नही पता। मसान फिल्म अगर देवी अंगवस्त्र मेँ ही बाहर भागती कि ये पुलिसवाले होटल मेँ धंधा कराने लाये है तो दरोगा जी की दो मिनट मेँ औकात सामने आ जाती। अरे यार अब नंगे तो हो ही गये थोड़ा और नंगा सही। डर के आगे जीत है। अभी इतनी अंधेर नही है।

कैसी है यह मुहब्बत दोस्तो

यह कैसी मुहब्बत है दोस्तो 
सघन बदबू मेँ दीवारोँ पर लगी काई
और छत पर लगा मकड़ी का जाला देखकर
प्रेमिका का चेहरा बहुत याद आता है
यह कैसी मुहब्बत है दोस्तो? कवि क़ातिल है, 
किसान डाकू है ताज़िराते हिन्द का फ़रमान हैं- 
गेहूँ खेतोँ मेँ सड़ने देँ नज़्मेँ इतिहास न बन पायेँ
शब्दो का गला घोँट दो कल तक 
यह दलील बहुत दिलचस्प थी 
इस तीन रंग की जिल्द पर नया काग़ज चढा लेँ- 
लेकिन एवरेस्ट पर चढना मुझे अब दिलचस्प नहीँ लगता 
मैँ हालात से समझौता कर साँस घसीटना नही चाहता 
मेरे यारो! मुझे इस क़त्लेआम मेँ शामिल हो जाने दो पाश

महबूब ने मेरी हर बात बदल दी...


हवा के इक झोके ने रुख-ए-ज़िन्दगी बदल दी... 
जाने कहाँ से कहाँ की तय मंजिल बदल दी... 

महबूब ने मेरे जाने कौन सी बात ली दिल पर... 
कि उस बात ने मेरी हर बात बदल दी... 

कोई तकरार हुई होती तो कूछ समझ आता... 
अनजान किसी लम्हे ने सारी कायनात बदल दी... 

हम दिल को बता समझाए बहलाए कैसे...
जब तुम ने मेरी दिन -ओ-रात बदल दी..

नफरत इस हद तक पाल ली दिल में.. 
बोले हमे पसंद करना भी बन्द कर दो...

Wednesday, 12 August 2015

"स्त्री" होना अपराध है क्या?

क्या "स्त्री" होना अपराध है ? दिन भर ताना सुन कर भी, कितनी खुश होती है वो... बिना 'खाने' के दिन गुजर जाता है उसका... बिना 'शिकायत' के जिंदगी गुजार देती है 'वो'... फिर भी उस पर ये 'इन्सान' इतना 'शैतान' क्यों है ? हैवान क्यों है ? क्या अपराध किया जो वो "स्त्री" हुयी ? राते बिता देती है वो रोटी से बाते करके... अगर एक दिन 'मै' देर से आया... घर में अकेले पूरी 'जिंदगी' बिता देती है 'वो' सीमा में खड़े 'पति' के लिए.... साथ कोई हो न हो 'वो' हमेशा साथ खड़ी होती है... कभी भी, कही भी, कैसे भी, फिर भी उसकी सांसो में चीत्कार क्यों ? क्या अपराध है उसका यही की वो "माँ", "पत्नी" या "बहिन" है ... एक प्रश्न.... कौन है औरत ??? आज समाज कितना भी प्रगतिशील हो गया है फिर भी उसकी सोच पुरातन है …इस प्रश्न का उत्तर अब उसे खुद खोजना होगा . आइये अब चलें ब्लॉग 4 वार्ता की ओर कुछ उम्दा लिंक्स के साथ.....
जैसा यहाँ होता है वहाँ कहाँ होता है कभी कभी बहुत अच्छा होता है जहाँ आपको पहचानने वाला कोई नहीं होता है कुछ देर के लिये ही सही बहुत चैन होता है कोई कहने सुनने वाला भी नहीं कोई चकचक कोई बकबक नहीं जो मन में आये करो कुछ सोचो कुछ और लिख दो शब्दों को उल्टा करो...जिंदगी के रंगमंच पर !!!जिंदगी के रंगमंच पर लगाकर आईना जिंदगी ने, हर लम्‍हा इक नया ही रंग दिखाया है जिंदगी ने । ख्‍वाब, हो ख्वाहिश हो या फिर हो कोई जुस्‍तजू, कदमों का साथ हर मोड़ पे निभाया है जिंदगी ने । मैं उदास हूँ..पानी में पानी का रंग तलाशना जता देना है कि मैं उदास हूँ। ख़ुशी में ग़म तलाशना जता देना है कि मैं उदास हूँ। ऊँची पहाड़ियों पर घाटियों को निहारना जता देना है कि मैं उदास हूँ।
चित्र-कविता - सूरज, की तरह स्थिर रहो सबके जीवन में नदी की तरह बह निकलो सबके जीवन से पेड़ जैसे छाया दो सबको जीवन में धरा सा बसेरा दो सबको अपने मन में ...हाशिया - हाशिये पर रहने वालों के न पेट होते हैं न जुबाँ न दिल न होती हैं उनकी जरूरतें आखिर सुरसा भी क्यों उन्ही के यहाँ डेरा जमाये तो क्या नहीं होती उनकी कोई ..बेसुध ... - कहीं थक न जाऊं खुद अपनी तकदीर लिखते लिखते 'उदय' तुम, … यूँ ही, … मेरा हौसला बनाये रखना ? … उनके झूठ पे, सौ लोगों ने सच होने की मुहर लगा दी है 'उदय' और सच...
प्रश्नोत्तर - प्रश्नचिन्ह मन-अध्यायों में, उत्तर मिलने की अभिलाषा । जीवन को हूँ ताक रहा पर, समय लगा पख उड़ा जा रहा ।।१।। ढूढ़ रहा हूँ, ढूढ़ रहा था, और प्रक्रिया फिर दोहरा...एक ब्लागर की चिट्ठी प्रधानमंत्री जी के नाम - क्या अब सचमुच शुद्ध हो पाएंगी गंगा? - प्रधान मंत्री जी गंगा के शुद्धिकरण को लेकर आप कटिबद्ध हैं। मगर तनिक रुकिए - गंगा शुद्ध हो यह कोटि कोटि जनों की मांग है। गंगा संस्कृति प्रसूता है ...कामयाबी और नकामी - कभी भी 'कामयाबी' को दिमाग और 'नकामी' को दिल में जगह नहीं देनी चाहिए। क्योंकि, कामयाबी दिमाग में घमंड और नकामी दिल में मायूसी पैदा करती है।क्यूट-क्यूट है दोस्त हमारी - बाल कविता - बिल्कुल इस गुड़िया के जैसी क्यूट-क्यूट है दोस्त हमारी जब हम कोई खेल खेलते देती मुझको अपनी बारी कभी न लड़ती, सदा किलकती बस खुशियाँ ही बरसाती है मीठी-मीठी...
अचानकमार : वनवासी की यात्रा - काफ़ी दिन हो गए थे जंगल की ओर गए, जैसे जंगल मेरा घर है जो हमेशा बुलाता है। कहता है आ लौट आ, मिल ले आकर मुझसे। अब पहले जैसा नहीं रहा, जैसा तू छोड़ कर गया था। ..कविता तुम्हारी - नही पढ पाता मैं भावोत्पादक कविताएं सीधे दिल में उतरती हैं और निर्झर बहने लगता है एक एक शब्द अंतर में उतर कर बिंध डालता है मुझे आप्लावित दृग देख नहीं पाते छवि...वन संपदा - 1--धानी चूनर पहनी धरती नें छटा असीम योवन छलकता मन छूना चाहता | 2--है हरीतिमा मनोरम दृश्य है महका वन पक्षी पंख फैलाते चैन की सांस लेते ..
नियती... - नियती घट की अंतिम बूंदों सी विदा बेला पर जीवन रेखा के समाप्ति काल तक ऐसे लगी रहेगी दृष्टि उस द्वारे पर जैसे कोई मोर व्याकुल नेत्रों से बैठ तकता है .ख़ामोशी - तन्हाई में जिनको सुकून-सा मिलता है, आईना भी उनको दुश्मन-सा लगता है। दिल में उसके चाहे जो हो तुझको क्या, होठों से तो तेरा नाम जपा करता है। तेरी जिन आंखों मे...बंधन और बाँध - में फर्क है ! - कोई बंधन में डाले या हम स्वयं एक बाँध बनाएँ - दोनों में फर्क है ! तीसरा कोई भी जब रेखा खींचता है तो उसे मिटाने की तीव्र इच्छा होती है न मिटा पाए तो एक समय...
क्यों से क्यों तक....... - क्यों ? सबसे कमजोर क्षणों में तुम्हारी ही सबसे अधिक आवश्यकता होती है और आलिंगी सी तू फलवती होकर चूकी कामनाओं में भी सरसता बोती है..... क्यों ? जब मैं व्यर्थ... किताब का जादू - वो एक लम्बे अरसे से इस किताब को पढ़ रहा था।किताब जैसे उसके व्यक्तित्व का हिस्सा हो गयी थी। किताब उस आदमी में कुछ भी अतिरिक्त जोड़ती न थी। न कम ही करती थी। पर...याद की पगडंडियाँ और सुख - हवा हर कोने में रखती है ज़रा ज़रा सी रेत। रेत पढ़ती है रसोई की हांडियों को, ओरे में रखी किताबों को, पड़वे में खड़ी चारपाई को, हर आले को, आँगन के हर कोने को। ...

मेरी सांसें मेरी धड़कन

मेरी सांसें मेरी धड़कन तू मौसम की रवानी है
रगों में इश्क तेरा है, तू ही अब जिंदगानी है।

ये उजली-सी सुबह तू है, तू ही अब शाम है
मेरी ये तारे, चांद, ये ऋतुएं, तेरी ही बस कहानी हैं

जीवन की नदी में एक नाजुक कंकड़ी-सी ये
मोहब्बत, मेरे ख्वाबों मेरी यादों से पुरानी है।

मेरी सांसों का मकसद तू, मेरे जीवन का हासिल तू 
तेरी सूरत, तेरी आंखें खुदा की मेहरबानी हैं। 

तुझे एक पल भी जो भूलूं, लगे जिंदा नहीं हूं 
मैं तेरा हंसता हुआ चेहरा मेरी आंखों का पानी है।

भले मजबूर हूं कितनी, मैं तुझसे दूर हूं 
कितनी तेरी सांसें मेरी धड़कन, तेरी ही मैं 

दीवानी हूं। मेरी शोहरत है तू, चाहत है तू,
अभिमान तू ही है मैं जिंदा हूं तो तू ही मेरे 

जीने की निशानी है। तेरी हसरत करूं न तो करूं 
क्या ये बता दे तू तेरे दम से मोहब्बत है, तेरे दम से जवानी है।

मंदी का नाम सुनते ही दिमाग की सारी नसें जकड़ गई।

जब से रघुराम राजनजी का 'महामंदी' वाला बयान पढ़ा है, अपनी तो हालत 'खस्ता' से भी 'गई-बीती' हो गई है। मंदी का नाम सुनते ही दिमाग की सारी नसें जकड़ गई हैं। न कुछ ढंग का सोच में आ पा रहा है, न समझ में। रह-रहकर 2008 वाली मंदी के सपने डराए जा रहे हैं। 2008 की मंदी में मुझ सहित जाने कित्तों ने क्या-क्या और कैसे-कैसे 'कष्ट' झेले थे अगर लिखने बैठें तो पूरा 'उपन्यास' ही तैयार हो जाएगा। मगर अपने निजी व पेशागत 'कड़वे अनुभवों' को लिखना यों भी इत्ता आसान नहीं होता पियारे। तसलीमा नसरीन और खुशवंत सिंह जित्ता 'जिगर' चाहिए होता है।
बताते हैं, 1930 की महामंदी ने पूरे विश्व के टांके पूरे एक दशक तक ढीले रखे थे। जाने कित्ते ही बैंक बर्बाद हो लिए थे। जाने कित्ते ही निवेशक राम को प्यारे हो लिए थे। स्टॉक मार्केट का तो भट्टा ही बैठ गया था। मार्केट ने एक ही दिन में इत्ता तगड़ा गोता लगाया था कि सब तरफ त्राहिमाम-त्राहिमाम मच गया था। विश्व ने कैसे उस महामंदी को झेला होगा, सोचकर ही दस्त होना शुरू हो लेते हैं अपने तो।
खूब याद है। न भूला हूं रत्तीभर भी 2008 की मंदी की मार को। शुरूआत स्टॉक मार्केट के भर-भराकर लुढ़कने से हुई थी। देखते ही देखते मार्केट और इनवेस्टर्स की वाट लग गई थी। उधर मार्केट में सर्किट पर सर्किट लगे जा रहे थे, इधर इनवेस्टर का दिल बैठे जा रहा था। दिल बैठने के चक्कर में न जाने कित्ते खर्च भी हो लिए थे।
बाद में मंदी ने जो अपना 'रौद्र' रूप दिखाया फिर तो यहां-वहां से हर रोज यही खबरें आती रहती थीं कि फलां कंपनी ने इत्ते एम्लाइ को निपटा दिया, फलां ने इत्ते। हालत यह हो गई थी कि सुबह दफ्तर जाने का तो पता रहता था पर शाम तलक सही-सलामत लौटने का नहीं। क्या पता कब टका सा जवाब मिल जाए- 'न जी कल से आप दफ्तर न आएं। घर पर ही आराम फरमाएं।'
सरकार की हालत कौन-सी भली-चंगी थी। राहत पर राहत पैकेज दे देकर कंपनियों की इज्जत बचा रही थी। हां, उस दौरान धरती पर अगर कोई सुखी था, तो वो नेता लोग ही थे। दुनिया की हर मंदी से बेफिक्र, मस्ती के साथ चैन की काट रहे थे। मंदी को छोड़िए, नेता लोग वैसे भी कौन से ज्यादा फिकरमंद रहते हैं सिवाय चुनावों में अपनी जीत-हार के।
तब से अब तक जैसे-तैसे मंदी की मार से थोड़ा-बहुत पार पाए हैं कि रघुराम राजनजी ने पुनः महामंदी की आशंका से डरा दिया है। सबसे बड़ा डर तो स्टॉक मार्केट के सेंसेक्स से लग रहा है। वो तो इत्ता संवेदी होता है कि विश्व में कहीं किसी को जरा-सी छींक भी आए तो चिंता के मारे लड़खड़ा कर गिर पड़ता है। फिर महामंदी की आशंका... खुदा खैर करे। सेंसेक्स का हिसाब तो 'हम तो डूबेंगे सनम, साथ में तुम्हें भी ले डूबेंगे' जैसा होता है।
मंदी को अगर आना है, तो आकर रहेगी। उसे न राजन साहब रोक सकते हैं, न सरकार, न वित्तमंत्री। मंदी बड़ी 'बौड़म' होती है। कब किसके साथ क्या कर दे, कोई नहीं जानता।
पियारे अपनी सलाह तो यही है कि अपने पिछवाड़े और अपना दिल मजबूत रखो। ताकि हर तरह की मंदी से सीना चौड़ा कर निपटा जा सके। सरकार और नेता लोगों का क्या है, ऐन टाइम पर अपने-अपने हाथ खड़े कर देंगे, जैसे पिछले दिनों किसानों की आत्महत्या पर कर दिए थे। बिचारे किसान... फसल तो बर्बाद हुई ही, खुद भी बर्बाद हो लिए। सौ बात की एक बात- न सगी मंदी होती है, न सरकार, न नेता।
फिलहाल, अब से अपने छोटे-मोटे खरचे सब बंद। जो जरूरी है, केवल वही करेंगे। महंगी न पीकर सस्ती पीएंगे। महंगे साबुन से न नहाकर सस्ते वाले से नहाएंगे। महंगे रेस्त्रां में न जाकर ढाबे पर जाएंगे। ब्रांडेड कपड़े न पहनकर फड़-ठेले से खरीदकर पहनेंगे। स्मार्टफोन की जगह लैंड-लाइन का प्रयोग करेंगे। वाट्सऐप की जगह चिट्ठी-पत्री लिखा करेंगे। जो-जो एडजस्टमेंट हो सकेगा, सब करेंगे। खुद पर कंट्रोल करने से ही बात बनेगी।
फिर भी, ऊपर वाले से यही प्रार्थना रहा हूं कि रघुराम राजनजी की आशंका आशंका ही बनी रहे 'हकीकत' में न तब्दील हो।

प्रधानमंत्रीजी ने 'डिजिटल इंडिया' की नींव रखी है,

प्रधानमंत्रीजी ने जब से 'डिजिटल इंडिया' की नींव रखी है, मेरे मोहल्ले में 'जश्न' का सा माहौल है। हर चेहरा डिजिटली खिला-खिला दिख रहा है। डिजिटल इंडिया को ध्यान में रखते हुए, मोहल्ले वाले लंबी-लंबी प्लानिंग बनाने में जुट गए हैं। प्लानिंग क्या है, छोड़ा-छाड़ी ही अधिक है।
मोहल्ले के लौंडों को 'डिजिटल इंडिया' में 'डिजिटल' ही अधिक आकर्षित कर रहा है। उनके तईं डिजिटल का मतलब है, केवल स्मार्टफोन और इंटरनेट...। स्मार्टफोन से उनका सरोकार केवल फेसबुक-टि्वटर-वाट्सएप से ही जुड़ा है। डिजिटल के बहाने स्मार्टफोन से और भी कई खास काम हो सकते हैं, इससे उन्हें ज्यादा कुछ लेना-देना नहीं। अब तलक वे स्मार्टफोन पर 'सादा इश्क' फरमा रहे थे, अब से 'डिजिटल इश्क' फरमाएंगे। डिजिटल टाइप ही उनकी प्रेमिकाएं होंगी। डिजिटल फॉरमेट में उनके बीच वायदे व लड़ाई-झगड़े होंगे। रिस्क लेकर एक-दूसरे से मिलने का झंझट भी कम होगा। अपने-अपने स्मार्टफोन पर एक-दूसरे से डिजिटली मिल लिया करेंगे।
वक्त के साथ-साथ इश्क में जहां इत्ती तब्दीलियां आई हैं, यह डिजिटल तब्दीली और सही।
मोहल्ले के राममूर्ति चचा अब डिजिटल तकनीक से ही अपनी डेयरी को चलाएंगे। डिजिटल विधि से अपनी गाय-भैंसों की देख-भाल व सानी किया करेंगे। डिजिटल तकनीक से ही उनका दूध निकालेंगे। यह भी खूब रहेगा कि हम मोहल्ले वाले पहली बार डिजिटल दूध पिएंगे। सोचिए जरा उन गाय-भैंसों के बारे में राममूर्ति चचा के यहां कित्ती डिजिटली खुश रहेंगी।
सुनने में यह भी आया है कि मोहल्ले के कुछ पति-पत्नी एक-दूसरे के साथ अब केवल 'डिजिटल रिलेशनशीप' में ही रहेंगे। डिजिटली एक-दूसरे से बातें करेंगे। डिजिटली एक-दूसरे का ख्याल रखेंगे। डिजटली एक-दूसरे के लिए शॉपिंग करेंगे। खाना भी डिजिटल फॉरमेट में ही खाएंगे-बनाएंगे। और, लड़े-झगड़ेंगे भी डिजिटली ही। यहां तक कि तलाक भी डिजिटली ही होगा। डिजिटल रिलेशनशीप हर प्रकार के सामाजिक व पारिवारिक बंधनों से मुक्त रहेगी।
जब सब डिजिटल हो रहे हैं तो मोहल्ले के भिखारी भला कैसे पीछे रह सकते हैं। मीटिंग कर मोहल्ले के भिखारियों ने तय किया है कि अब से वे सिर्फ 'डिजिटल भीख' ही लिया करेंगे। हिस्सा भी उनके बीच डिजिटल फॉरमेट ही बंटेगा। घर-घर, गली-गली, मोहल्ले-मोहल्ले जाकर भीख मांगने से उन्हें मुक्ति मिलेगी। भिखारियों ने भीख की फीस भी बढ़ा दी है। सौ-पचास नहीं सीधे पांच सौ रुपए। उनका कहना है, जब डिजिटल इंडिया में रहना है, तो भीख का स्टैंडर्ड खराब नहीं करेंगे। जिन्हें देना हो दे नहीं तो कट ले।
देख रहा हूं, मोहल्ले में हर किसी के बीच डिजिटल होने की होड़ ठीक वैसे ही मची है, जैसे पिछले दिनों गैस-सब्सिडी लेने की मची हुई थी। मोहल्ले में बस एक मैं ही अभी डिजिटल नहीं हुआ हूं। जबकि बीवी हाथ धोकर मेरे पीछे पड़ी रहती है कि मैं किसी तरह डिजिटल हो जाऊं। यहां तक कि उसने धमकी भी दे डाली है अगर मैं डिजिटल नहीं हुआ तो मुझे तलाक भी दे सकती है। मगर इस डिजिटलगिरी को जिस नजरिए से मैं देख रहा हूं शायद बीवी न देख-समझ पाए। इसीलिए मैं अभी डिजिटल नहीं हो रहा हूं। 
सोच के साथ शौचालय अभी ढंग से 'डेवलप' हुए नहीं हैं और हम लगे हुए हैं 'डिजिटल इंडिया' होने में। वाह...!

ग्रीस संकट की खबर फैली है

संकट ग्रीस पर आया है, चिंताएं हमारी बढ़ गई हैं। कथित चिंताओं और चिंता के मामले में हम कुछ ज्यादा ही 'सजग' रहते हैं। हाल यह है, अगर हमारे पड़ोसी को भी जरा-सी छींक आ जाए तो हम चिंतित हो जाते हैं। चिंतित भी ऐसे होते हैं कि बिचारे को किस्म-किस्म की सलाहें दे-देकर 'अधमरा' कर देते हैं। बंदा अपनी चिंता से पहले ही परेशान होता है, ऊपर से हमारे चिंता करने के ढंग पर और चिंतित हो जाता है।
हमारे तईं ग्रीस संकट भी कुछ ऐसा ही चिंता का विषय है। तब ही तो, जब से ग्रीस संकट की खबर फैली है, हमारे शेयर बाजार धम्म से बेदम हो गए हैं। एक ही दिन में पांच सौ प्वांइट का गोता लगा आए। हालांकि शाम होते-होते थोड़ा 'संभल' गए। पर खुद को चिंताग्रस्त तो कर ही लिया न। ऊपर से 'कुर्बान' जाऊं कथित बिजनेस चैनलों का जिन पर आने वाले महा-पंडित और महा-ज्ञानी लोग- ग्रीस संकट के खौफ में- शेयर बाजार को खुलने से पहले ही गिरा डालते हैं। वहां जित्ते मुंह होते हैं, उत्ती बातें होती हैं। एक तो बंदा पहले ही शेयर बाजार की खस्ता हालत से दुखी होता है, ऊपर से ज्ञान बघारने वाले उसकी सिट्टी-पिट्टी और गुम कर देते हैं।
अभी कल की तो बात थी, जब राघुराम राजन साहब ने 'संभावित महामंदी' की आशंका से हमें चेताया था। उसके अगले ही दिन ग्रीस संकट ने आग में और घी छिड़क दिया। अब आप ही बताएं कि ऐसे में दिल जले न तो और क्या करे? अभी 2008 की मंदी से ढंग से पार पाए नहीं थे कि अब 'महामंदी' का खतरा। महामंदी की भविष्यवाणी और ग्रीस संकट के तोते ने न केवल सरकार बल्कि निवेशकों के होश भी फाखता कर दिए हैं।
 अच्छा हम भी खूब हैं, जरा-जरा सी बातों में हाथ-पैर छोड़ बैठते हैं। अमां, संकट ग्रीस में आया है। दिवालिया वहां के बैंक और अर्थव्यवस्था हो रही है। तो फिर हम क्यों 'बेगानी बर्बादी में खुद बर्बाद' हुए जा रहे हैं। जैसे- एक होड़-सी लगी हुई है कि अगर दुनिया भर के शेयर बाजार गिरे हैं, तो हम भी गिरेंगे। दरअसल, शेयर बाजारों का हाल कुछ यों होता है- गिरने के मामले में 'हम साथ-साथ हैं' और बढ़ने के मामले में 'हम आपके हैं कौन'। इस रस्साकशी में मारा बिचारा निवेशक जाता है। हालत ग्रीस के बाजार की पतली है, दुबलापन हम पर चढ़ने लगा है।
हर वक्त 'नकारात्मकता' में पड़े रहना भी ठीक नहीं। ग्रीस संकट के नुकसान जो हैं सो हैं पर कुछ फायदे भी हैं। ग्रीस संकट के कारण कच्चे तेल (क्रूड) की कीमतों में गिरावट के चलते पेट्रोलियम उत्पाद सस्ते हो सकते हैं। महंगाई दर में कमी आ सकती है। ब्याज दरें कम हो सकती हैं। इत्ता सब तो संकट होने के बावजूद मिल सकता है, और क्या चाहिए? फिर आरबीआइ और सरकार 'निगाह' बनाए हुए हैं न। तिस पर भी अगर कोई चिंता पर चिंता बढ़ाना चाहे तो उसे 'बेवकूफ' ही कहा जाएगा। माना कि दूसरे की चिंता में साथ देना चाहिए, लेकिन इत्ता भी नहीं कि खुद पर ही चिंताएं ओढ़ ली जाएं। 
संकट चाहे ग्रीस का हो या शेयर बाजार का इससे तो कैसे भी पार पाया जा सकता है लेकिन बेवजह अपनी खोपड़ी को ओखली में देने वाली मानसिकता से कभी कोई पार नहीं पा सकता। जैसे-तैसे हमारा शेयर बाजार और अर्थव्यवस्था थोड़ा पटरी पर आई है, हम फिर से आमादा हो लिए हैं, उसे 'ढहाने' में। अमां, चिंताएं छोड़ो। 
ग्रीस का संकट ग्रीस को देखने दो। बस अपनी 'बैक' मजबूत रखो ताकि ग्रीस जैसे संकट हमें 'ग्रीस' न लगा सकें।

व्यापमं एक ऐसा घोटाला बन गया है

व्यापमं की व्यापकता दिन-ब-दिन बढ़ती ही चली जा रही है। हर रोज किसी न किसी के बारे में कोई न कोई 'बुरी खबर' आ ही जाती है। कभी-कभी तो लगता है कि व्यापमं घोटाला नहीं किसी 'हॉरर' फिल्म सरीखा है। जिसमें भूत कब, कहां और कित्तों की जान लेगा, कुछ पता नहीं चलता। एक झटके में किसी की भी 'मौत' हो जाती है मगर यह कोई नहीं जानता कि किसने की? सीबीआइ से लेकर एसआइटी तक के हाथ फिलहाल 'खाली' हैं। नेता लोगों ने आड़े-तिरछे बयान दे-देकर मामले को और 'संगीन' टाइप बना दिया है।
यों, अपने देश में हमनें इत्ते टाइप के बड़े से बड़े घपले-घोटाले देखे हैं मगर किसी में सीधे-सीधे किसी ने किसी की जान लेने की कोशिश नहीं की। घोटालों की पैरवी करते-करते अपराधी लोग या तो खुद ही खर्च हो लिए या फिर अंदर हो गए। मगर व्यापमं एक ऐसा घोटाला बन गया है, जिसमें असली अपराधी तो छोड़िए नकली तक का मिल पाना मुश्किल जान पड़ रहा है। सब मिलकर, अपने-अपने तरीके से, अंधेरे में तीर छोड़े चले जा रहे हैं। न निशाना ठीक बैठ पा रहा है, न ही तुक्का।
व्यापमं घोटाले का स्वभाव 'खूनी' बन गया है। जो इसके कने जाता है, निपटकर ही बाहर निकलता है। ऐसा घोटाला भी भला किस काम का जिसमें लोगों की जान से खेला जाए। अब तलक हुईं चालीस से ऊपर मौतों ने घोटाले के चरित्र पर ही सवाल खड़े कर दिए हैं। यह सही है कि घोटाले का चरित्र 'करप्ट' होता है मगर खूनी होने के परिणाम संभवता पहली दफा देखने को मिल रहे हैं।
देश और समाज के बीच व्यापमं का खौफ गब्बर सिंह जैसा बना हुआ है। गांव-देहात में जब बच्चा रोता था, तो मां कहती थी, चुप हो जा वरना गब्बर आ जाएगा। अब मां रोते हुए बच्चे से कहती है, चुप हो जाना वरना व्यापमं आ जाएगा। मैं खुद रात को हनुमान चालिसा पढ़कर सोता हूं, कहीं व्यापमं न आ जाए। फिलहाल, हनुमानजी मुझ पर 'कृपा-दृष्टि' बनाए हुए हैं।
सच बोला है किसी ने कि बाजी पलटते देर नहीं लगती। जो बीजेपी कल तलक मनमोहनजी को घोटालों पर 'चुप्पी' साधे रखने के लिए ताने मारा करती थी, आज उसी की सरकार के प्रधानमंत्रीजी की बोलती व्यापमं पर बंद है। 'सेल्फी विद डॉटर' से लेकर 'डिजिटल इंडिया' तक की बातें तो खूब हो रही हैं किंतु व्यापमं पर मौन तारी है। कहीं यह 'होड़' तो नहीं- 'मेरा मौन तेरे मौन से कमतर नहीं'- टाइप। प्रधानमंत्रीजी जब इत्ता सारा-सारा बोल लेते हैं फिर व्यापमं पर भी बोलना चाहिए न। ताकि देश और जनता 'पार्टी विद डिफरेंस' का असर भी देख-समझ सके। है कि नहीं...।
मौन में अक्सर 'गूढ़ रहस्य' छिपा लिए जाते हैं। कहीं ये व्यापमं से जुड़े उन्हीं गूढ़ रहस्यों को छिपाने की कवायद तो नहीं। 'न खाऊंगा, न खाने दूंगा' कि तर्ज पर 'मौन रहूंगा, मौन ही रहने दूंगा।'

मुझे रंगीन सपने कम आने लगे हैं।

अब रात में मुझे 'रंगीन सपने' कम आने लगे हैं। रंगीन सपनों की जगह 'ललित मोदी के सपने' ने ले ली। रात को जब मैं सोता हूं, थोड़े देर बाद ही मुझे ललित मोदी बनने का सपना अपनी आगोश में ले लेता है। सपनों-सपनों में ही मैं ललित मोदी बनने का सपना देखने लगता हूं। हालांकि मैं जानता हूं वास्तविता के धरातल पर ललित मोदी बनना बहुत कठिन है लेकिन सपने का क्या करूं, जो मुझे रोज रात को ललित मोदी बनने के लिए 'उकसा' जाता है।
ललित मोदी होना इत्ता आसान नहीं। विरले ही होते होंगे, जो ललित मोदी टाइप बन पाते हैं। पूरे ललित मोदी फिर भी नहीं। ललित मोदी अपने आप में एक चलती-फिरती महान शख्सियत हैं। उनके जैसा दिमाग पाना, उनके जैसे ऊंचे राजनीतिक संबंध स्थापित करना, उनके जैसे क्रिकेट से लेकर सामाजिक कामों तक में खास रूतबा बनाकर रखना हर किसी के बस की बात नहीं। मात्र एक ललित मोदी ने देश-विदेश से लेकर, सरकार और मंत्री तक की अच्छे से बैंड बजा रखी है।
उनका मात्र एक ट्वीट ही सब पर भारी पड़ जाता है। पानी मांग जाते हैं अच्छे-अच्छे उनके ट्वीट बम पर। टि्वटर पर ट्रेंड करने वालों में सबसे टॉप पर ललित मोदी ही हैं। क्या अखबार, क्या टीवी चैनल, क्या सड़क, क्या दफ्तर, क्या राजनीतिक हलके हर जगह बस ललित मोदी ललित मोदी ही छाए हुए हैं। कभी-कभी तो मुझे लगता है कि दुनिया में अगर ललित मोदी न होते तो इत्ते थोक के भाव में न खुलासे होते, न इत्ता भारी मनोरंजन ही हो पाता। ललित मोदी क्रिकेट से लेकर सियासत तक के हर गेम के 'मास्टर' हैं।
अब इत्ती ऊंची शख्सियत टाइप बनने का सपना देखना, बेशक मेरे तईं 'गर्व' का प्रतीक हो सकता है, बावजूद इसके मेरा ललित मोदी बनना कम से कम इस जन्म में तो संभव नहीं।
यों भी, सपने में देखी हर बात सच हो ही जाए, यह जरूरी तो नहीं। फिर भी, ससुरे सपने इंसान को सपना दिखाने से बाज नहीं आते। अभी कल ही की तो बात थी, जब मुझे सनी लियोनी का हजबैंड बनने के सपने आया करते थे। पूनम पांडे संग फिल्म करने के सपने आया करते थे। दाऊद इब्राहिम से बड़ा डॉन (भाई) बनने के सपने आया करते थे। बड़ा लेखक और बड़ा नेता बनने के सपने तो रोज-ब-रोज दिन में कित्ते ही आ जाते हैं। 
मेरी तो जाने दीजिए, खुद कभी ललित मोदी ने सपने में नहीं सोचा होगा कि एक दिन वो ललित मोदी बन जाएंगे। लेकिन पियारे इंसान की किस्मत बदलते और बीवी का बेलन पड़ते दे ही कित्ती लगती है। ललित मोदी की मशहूरित को फोकस कर-करके मीडिया के साथ-साथ टि्वटर भी खूब मशहूर हो गया है। किसी और की क्या कहूं, मेरे मोहल्ले के न जाने कित्ते लौंडों ने टि्वटर पर अपना एकाउंट बना डाला है। उन्होंने भी भीतर यह खुशफहमी पाल ली है कि टि्वटर के रास्ते एक दिन उनके फॉलौअर्स की संख्या भी ललित मोदी जित्ती हो जाएगी! 
ललित मोदी बनने का सपना आने वाली बात मैंने केवल आप लोगों से ही 'शेयर' की है, पत्नी को तो इस सपने की भनक तक नहीं लगने दी है। कहीं उसे मेरे इस सपने की खबर हो जाती न तो मेरा तो जीना ही हाराम हो जाता। वो तो हकीकत में ही मेरे पीछे पड़ जाती कि तुम्हें ललित मोदी बनना ही बनना है। हाई-प्रोफाइल बंदों की वो इत्ती दीवानी है कि उसने हमारे बेडरूम में ही उनकी तस्वीरें टांग रखी हैं। एक दफा मैंने उससे सलमान खान बनने की इच्छा जाहिर कर दी थी। तब की व्यक्त की गई इच्छा की कीमत आज तलक चुका रहा हूं।
 सपने भी न कभी-कभी कबाड़ा कर डालते हैं। अभी पता नहीं कब तलक मुझे ललित मोदी बनने का सपना झेलना पड़ेगा। अभी मैं ढंग से लेखक तक तो बन पाया नहीं हूं, ऊपर से ललित मोदी बनने का सपना मेरी जान की ऐसी-तैसी किए हुए है। न जाने इत्ते बड़े-बड़े (भयंकर टाइप के) सपने मुझे ही क्यों आते हैं? ललित मोदी बनने का सपना भी उनमें से एक है। हाय...!

नेता भ्रष्टाचार व घोटालों से दूर रहकर जनता की सेवा करने की 'शपथ' लेता है

राजनीति और नेता बरसों से एक-दूसरे के 'पूरक' रहे हैं। राजनीति की गाड़ी नेता के बिना, नेता की राजनीति के बिना चल ही नहीं सकती। दोनों एक ही गाड़ी में सवार होकर लंबा सफर तय करते हैं। बिना संघर्ष के राजनीति हो नहीं सकती और हमारे देश के नेता लोग राजनीति के वास्ते संघर्ष करने में न कभी पीछे रहे हैं, न रहेंगे। नेता का राजनीति से 'रोटी-बेटी' जैसा नाता जो है।
नेता और राजनीति के समानांतर भी कुछ चीजें साथ-साथ चलती रहती हैं। साथ-साथ चलने वाली चीजों में यों तो बहुत-सी हैं मगर कुछ सालों से जो भयंकर रूप से दोनों के साथ चल रही है, वो है- 'घपले-घोटाले'। गौरतलब है कि राजनीति में नेता की संलिप्ता जनता से कहीं अधिक घोटालों के साथ बढ़ रही है। अपवादों को छोड़ दिया जाए तो किसी न किसी नेता का खाता घोटालों के बैंक में खुला ही है। नेता लोग राजनीति से कहीं ज्यादा ध्यान घपलों-घोटालों पर देने लगे हैं। या यह कहना ज्यादा उचित होगा कि नेताओं ने घोटालों को राजनीति का प्रमुख अंग बना लिया है। जिस नेता का जित्ता बड़ा कद, उसका घोटला भी उत्ता ही बड़ा।
कमाल यह है कि नेता बनते वक्त जो नेता भ्रष्टाचार व घोटालों से दूर रहकर जनता की सेवा करने की 'शपथ' लेता है, अंततः कूदता उसी खाई में है, जहां से बाहर आने का कोई 'चांस' नहीं होता। जनता की याद नेता को पांच साल में एक बार चुनावों के दौरान वोट मांगने के लिए ही आती है। बाकी साल वो जनता के वोट पर 'ऐश' कर अपनी व अपने चाहने वालों की 'नैया' पार लगाता रहता है। कभी-कभी तो लगता है कि हमारे देश के नेता लोग वोट 'जन-हित' के वास्ते नहीं केवल राजनीति और घोटाले करने के लिए ही लेते हैं।
मैंने नेताओं के चेहरों पर चिंता और माथे पर शिकन वोट मांगने और चुनाव लड़ने के दौरान तो खूब देखी है लेकिन यह तब गायब होती है, जब किसी नेता का नाम किसी घोटाले से जुड़ता है या घोटाले के कारण वो अंदर जाता है। घोटाले करना शायद हमारे देश के नेताओं के लिए बहुत सामान्य-सी बात हो गई है। उन्हें यह अच्छे से मालूम है कि हमारे यहां घपलों-घोटालों पर थोड़ दिन तो खूब हो-हल्ला कटता है फिर धीरे-धीरे कर सब सामान्य हो जाता है। जनता सब भूल-भाल कर अपने-अपने काम-धंधे में लग जाती है और मीडिया अन्य ब्रेंकिग न्यूज में बिजी हो जाता है।
इसीलिए नेता लोग अपनी-अपनी दालें घोटालों के बीच गलाते रहते हैं। जिसकी दाल गल जाती है, वो राजा हो जाता है। जिसकी नहीं गल पाती, वो दूसरे की सूखाने में लग जाता है।
आजकल तो हर तरफ बस व्याप्मं घोटाले के ही चर्चे हैं। मीडिया से लेकर सोशल नेटवर्किंग तक पर व्याप्मं ही व्याप्मं व्याप्त है। व्याप्मं का विस्तार इत्ता हो लिया है कि इसके सिरे ढूंढना ही मुश्किल हो जाता जा रहा है। व्याप्मं में जिस प्रकार एक बाद एक मौतों के मामले सामने आ रहे हैं, लोग बाग अब इसे 'खूनी-घोटाले' की संज्ञा देने लगे हैं। जिस-जिस के तार व्याप्मं से जुड़े मिल रहे हैं, वो-वो एक-एक कर बीच में से निपटता जा रहा है। मांएं अब अपने बच्चों को 'गब्बर' का नहीं 'व्याप्मं' का नाम लेकर डराकर चुप कराने लगी हैं।
देश और राजनीति के इतिहास में व्याप्मं संभवता ऐसा पहला घोटाला होगा, जिसके हाथ इत्ती मौतों से रंगे हैं। एकदम किसी हॉरर या थ्रिलर फिल्म की माफिक। कि, कौन-कब-कहां एक-एक कर संलिप्त लोगों को निपटाता चला जा रहा है। चलो व्याप्मं के बहाने लगभग खाली बैठे विपक्ष के हाथ बड़ा और तगड़ा मुद्दा आ गया है, सरकार के खिलाफ जमकर बोलने व नारेबाजी करने का।
 विपक्ष न जाने कित्तों के इस्तीफों की मांग कर चुका है मगर दिया अब तलक किसी ने भी नहीं है। ललित मोदी मामले में किसने दिया था, जो व्याप्मं में दे देंगे! 
इत्ती मेहनत से पाई कुर्सी को नेता यों ही थोड़े न जाने देगा पियारे। व्याप्मं घोटाले की व्याप्कता को देखकर बस यही ख्याल बार-बार मन में आता है कि राजनीति के साथ-साथ घोटाले भी अब नेताओं के चेले-चपाटे होते जा रहे हैं, जब और जहां चाहो काम में ले लो।

चेन-स्नेचरों सोने के दाम में गिरावट आई है

जब से सोने के दाम में गिरावट आई है, मेरे मोहल्ले के चेन-स्नेचरों का दम ही निकल गया है। ठलुओं की तरह निठ्ठले घूम रहे हैं आजकल। अखबार भी चेन-स्नेचिंग की खबरों के बिना सूने-सूने से लगते हैं। जो पुलिस कभी चेन-स्नेचरों को पकड़ने में दिन भर अस्त-वयस्त-पस्त रहा करती थी, वो भी खाली हो गई है। चौराहे पर बनी चौकी में एकाध सिपाही ही रहता है, वो भी नाम करने को।
सोने के भाव गिरने से हालांकि बहुत से लोग (खासकर महिलाएं) खुश हैं, लेकिन ऐसी खुशी का क्या मतलब जो किसी की रोजी-रोटी छीन ले। चेन-स्नेचिंग चेन-स्नेचरों के लिए रोजी-रोटी समान है। माना कि उनका धंधा गंदा है, पर धंधा तो है। कम से कम वे काम पर तो लगे हुए हैं न। ठलुओं की तरह निठ्ठले तो नहीं टहल रहे यहां-वहां। दिन भर में दो-चार चेनों पर हाथ साफ करने का मतलब है, अच्छी-खासी मोटी कमाई। इस बहाने उनकी जेब और गर्लफ्रेंड का खरचा तो निकल ही रहा है। क्या बुरा है।
चेन-स्नेचिंग को मामूली काम न समझिए। इसमें चरित्र का पूरा रिस्क है। चेन खींचकर भाग लिए तो ठीक। अगर कहीं पकड़े गए तो मार-कुटाई के साथ-साथ जेल की यात्रा भी करनी पड़ सकती है। इस लाइन में केवल वही लोग आते हैं, जिनका दिल कठोर होता है। कमजोर दिल वालों के लिए यहां कोई जगह नहीं। किसी की गर्दन पर हाथ साफ करना कोई छोटी बात थोड़े है। सोना जित्ता प्रिय पहनने वाले को है, उत्ता ही चेन-स्नेचर को भी। फिर भला कौन छोड़ना चाहेगा। 
इधर सोने के भाव ने गिरकर सब गड़बड़ कर दी है। एकदम उलटा हो लिया है। जब सोने के भाव बढ़ रहे थे, तब मेरे मोहल्ले की महिलाएं जमकर सोना पहन रही थीं मगर जब से भाव गिरे हैं, सोना पहनना इत्ता कम कर दिया है कि बिचारे चेन-स्नेचरों के धंधे-पानी पर बन आई है। सोना पहन जरूर कम रही हैं, मगर खरीद खूब रहीं। खरीद इस उम्मीद में ज्यादा रही हैं, वापस इत्ते कम रेट मिले न मिले। उन पतियों के बारे में जब सोचता हूं तो मेरा कलेजा मुंह को आ जाता है तो कित्ते टाइप के एडजस्टमेंट कर अपनी पत्नियों को सोना दिलवा रहे हैं। वाकई शबाश है उनको।
'अच्छे दिन' कब 'बुरे दिन' में परिवर्तित हो जाएं, कोई नहीं जानता। कल तलक जो लौंडे चेन-स्नेचिंग कर महंगी-महंगी गाड़ियों पर घुमा करते थे, शौक पूरे करने में कोई कोताही नहीं बरतते थे, गर्लफ्रेडों का खास ख्याल रखते थे, आज साइकिल और बीड़ी पर उतर आए हैं। जाने कित्तों की गर्लफ्रेडें उनको छोड़कर किसी और की हो ली हैं। वक्त और नसीब को पलटते देर ही कित्ती लगती है। यों, किसी के धंधे का मंदा होना मुझसे देखा नहीं जाता। 
रोजी-रोटी सबकी चलनी चाहिए। चाहे वो बिजनेसमैन हो या चेन-स्नेचर। दुआ ही कर सकता हूं कि सोना फिर से अपने 'अच्छे दिनों' में लौट गए ताकि चेन-स्नेचरों के 'बुरे दिन' टल सकें।

भिखारियों ने अपना एक 'एप' भी बना लिया है।

यह बताने वाली बात है इसीलिए बता रहा हूं। ज्ञानी भी कह गए हैं कि हर जरूरी बात दुनिया को अवश्य बतानी चाहिए ताकि दूसरे लोग 'प्रेरणा' ले सकें।
तो सुनिए..., मेरे मोहल्ले के भिखारी 'डिजिटल' हो गए हैं। जी हां, डिजिटल...। खुद को डिजिटल करने की 'प्रेरणा' उन्होंने मोदीजी के 'डिजिटल इंडिया मिशन' से ली है। मोहल्ले का कोई भी भिखारी अब हाथ में कटोरा लिए नहीं बल्कि टैब या स्मार्टफोन लिए दिखता है। भीख बेचारगी के साथ नहीं बल्कि पूरी ठसक के साथ मांगता है। भिखारियों ने अपना एक 'एप' भी बना लिया है।
जिससे भीख मांगते हैं, उसे उस एप का लिंक सेंड कर देते हैं। ताकि भीख का पैसा सीधा अपने खाते में ले सकें और साथ-साथ एप का एडवरटाजमेंट भी हो जाए। जित्ता ज्यादा से ज्यादा लोगों के पास एप का लिंक जाएगा, उत्ता ही उनकी भीख का स्तर बढ़ेगा।
कहने का मतलब है कि डिजिटल इंडिया ने मोहल्ले के भिखारियों को 'हाई-टेक' साथ-साथ घणा स्मार्ट भी बना दिया है। कुछ भिखारियों ने तो पारंपरिक ड्रेस झोले और मैले-कुचेले कपड़े की जगह जींस-शर्ट धारण कर ली है। झोले की जगह एक बेहतरीन-सा बैग ले लिया है, जिसमें वे अपना टैब या लेपटॉप रखते हैं। मजे की बात यह है कि वे अपने कपड़े और ऐस्सरीज भी अब ऑन-लाइन ही मंगवाने लगे हैं।
भिखारियों के पास अब छुट्टे नोट-पैसे नहीं मिलते। एक-दो या पांच का सिक्का देखकर ऐसे मुंह बनाते हैं मानो उनके हाथ में करेला रख दिया हो। मोहल्ले का कोई भी भिखारी सौ या पांच सौ से नीचे मांगता ही नहीं। आदमी का स्टैंडर्ड देखकर उससे उस स्तर की भीख मांगते हैं। भिखारियों ने बकायदा अपना एक नेटवर्किंग सेल भी बनाया हुआ है, जहां से उनके बंदे हर भिखारी पर नजर रखते हैं। उसे मिलने वाली भीख का हिसाब-किताब रखा जाता है। जहां जिसके भी हिसाब-किताब में गड़बड़ी मिलती है, उसके एकाउंट को तुरंत सीज कर दिया जाता है। उनका कहना है कि भीख के ट्रांजेक्शन में ट्रांसपेरेंसी होनी चाहिए। ताकि लोगों का भीख और भिखारियों पर विश्वास और पुख्ता हो सके।
मुझे लगता है, मोदीजी के डिजिटल इंडिया कॉस्पेट को भारत में अगर किसी ने बहुत तेजी से अपनाया व विकसित किया तो वे भिखारी ही हैं। देखिए न, ऑन-लाइन भीख से लेकर कटोरे की जगह टैब या स्मार्टफोन का आ जाना, डिजिटलाजेशन का ही तो कमाल है। वरना, खुद सरकारी दफ्तर अभी कित्ते और कहां तलक डिजिटल हुए हैं, शायद बतलाने की ज्यादा जरूरत नहीं। अपवादों को छोड़कर, ज्यादातर अब भी वही पुराने-दुराने ठर्रे पर चल रहे हैं। फाइलों-रजिस्टरों से बाहर निकल ही नहीं पाए हैं। बाबू लोगों के हाथों में स्मार्टफोन आ जरूर गए हैं, पर वे ज्यादातर उसका इस्तेमाल मूवी देखने या वाट्सएप चलाने में ही करते हैं। इससे और भी बहुत कुछ हो सकता है, मालूम होने के बाद भी, अनजान बने रहना ही पसंद करते हैं।
पर शाबाश है मेरे मोहल्ले की भिखारी बिरादरी को, जिसने इत्ती जल्दी खुद को डिजिटल कर दिखाया। सुनने में आया है कि दूसरे बड़े शहरो के भिखारी भी अब मेरे मोहल्ले के भिखारियों से डिजिटल तकनीक के बाबत मदद मांगने लगे हैं। कुछ तो ट्रेनिंग को भी आ चुके हैं।
डिजिटल इंडिया के बहाने की सही, यह क्या कम बड़ी बात है कि भिखारियों के दामन पर लगा बेचारगी का दाग धीरे-धीरे कर हट रहा है। भिखारी लोग भी तकनीक की मुख्यधारा में शामिल हो रहे हैं। 
भिखारियों की देखा-दाखी मेरे मोहल्ले के राममूर्ति चाचा ने भी अपनी डेयरी को धीरे-धीरे डिजिटल करना शुरू कर दिया है। पिछले दिनों मिले तो बतला रहे थे कि वे भी अब ऑन-लाइन दूध बचने की जुगाड़ में लगे हैं। अपनी गाय-भैंसों का डिजिटलाइजेशन कर ही रहे हैं। फिर डिजिटल तकनीक के माध्यम से ही उनका दूध निकाला व बंटवाया जाएगा। 
मुझे पक्की उम्मीद है कि धीरे-धीरे कर हमारे देश के शोषित व वंचित लोग भी डिजिटल होकर अपने हक की लड़ाई डिजिटली ही लड़ा करेंगे। जय हो मोदीजी के डिजिटल इंडिया मिशन की।

आत्मा की मुक्ति का सच्चा मार्ग है।

किसी धनी व्यक्ति के घर एक संत भिक्षा लेने के लिए गए। उस व्यक्ति के यहां एक तोता था वो पिंजरे में कैद था। तोता संत को देखकर बहुत खुश हुआ।
भिक्षा लेने के बाद जब संत जाने लगे तो तोते ने कहा, 'हे महात्मा! में इस पिंजरे में काफी दिनों से बंद हूं। जब में अपने साथियों को उड़ते हुए देखता हूं तो मुझे दुःख होता है कृपया आप कुछ उपाय बताए कि में यहां से मुक्त हो सकूं।'
वो संत भिक्षा के बाद अपने गुरु के पास पहुंचे और उन्होंने तोते की आप-बीती सुनाई। तोते द्वारा पूछा गया प्रश्न सुनकर गुरुजी बेहोश हो गए। सभी शिष्य घबरा गए। संत ने फिर से प्रश्न पूछना उचित नहीं समझा।
दूसरे दिन संत के आने की राह तोता देखता रहा। जब संत पहुंचे तो उन्होंने गुरु जी को प्रश्न सुनाने वाली घटना का जिक्र उस तोते से किया। वह तोता बोला, 'आपके गुरुजी ने मेरे प्रश्न का उत्तर आपको दिया हो या नहीं लेकिन उन्होंने मुझे मेरे प्रश्न का उत्तर दे दिया है।
अगले दिन तोते ने गुरु के संकेत का प्रयोग किया। वह पिंजरे में बेहोश होकर गिर पड़ा। यह देख धनी व्यक्ति ने उसे मरा जानकर पिंजरा खोला। तोता मौका मिलते ही उड़ गया। 
संतों ने संसार रूपी पिंजरे से मुक्त होने का भी यही उपाय बताया है, जीते हुए मृतवत् हो जाना जिससे ममत्व रूपी बंधन पैदा न हो। यही आत्मा की मुक्ति का सच्चा मार्ग है।

Sunday, 9 August 2015

तिहाड़ जेल का वातावरण आनंदमय है।

इन दिनों तिहाड़ जेल का वातावरण आनंदमय है। बेशक बाहर गर्मी-बरसात का दिक्कतें हो पर यहां सबकुछ कूल-कूल है। दिन कब में और कहां गुजर जाता है पता ही नहीं चलता। पता चले भी कैसे, क्योंकि तिहाड़ के भीतर आजकल बड़ी-बड़ी मशहूर हस्तियां जो मौजूद हैं। यकीनन यह तिहाड़ का सौभाग्य ही है कि उसे ऐसी मशहूर हस्तियों का संग-साथ मयस्सर हुआ। तिहाड़ सलाखों सहित उनकी ऋणी है।
यहां हर बैरक अपनी-सी अद्भूत कहानी लिए हुए है। एक तरफ कलमाड़ी जी अपने खेल में मस्त रहते हैं तो दूजी तरफ ए. राजा जी अपने स्पैक्ट्रम के हिसाब-किताब में व्यस्त। कनिमोझी के कने कविताओं की व्यस्तता है। मतलब कि यहां खाली कोई नहीं है। सबके कने अपने-अपने खास काम हैं। खाली रहना भी नहीं चाहिए क्योंकि ज्ञानी कह गए हैं कि खाली दिमाग शैतान का घर होता है।
दरअसल, व्यक्ति के मन को पहचानने का सबसे उत्तम स्थान जेल ही है। जेल के भीतर ही व्यक्ति का असली व्यक्तित्व सामने आ पता है। माना कि इन मशहूर हस्तियों ने बाहर बहुत-से घपले-घोटाले किए मगर जेल के भीतर वे हर प्रकार की बुरी आदतों से दूर हैं। आजकल खुद को बेहतर इंसान बनाने में जुटे हुए हैं। मेरी शुभकामनाएं उनके साथ हैं।
बंधु, बड़े ही नसीब वाले होते हैं वे, जिनके कने जेल की हवा और रोटी खाना व चक्की पिसना लिखा होता है। इतिहास उनके इस त्याग का गवाह बनता है। यह बड़ी बात है।
खैर, उनके जेल जाने के पीछे उद्देश्य जो भी रहा हो परंतु निभाया तो उन्होंने नैतिक फर्ज ही है न! इस फर्ज को निभाने के अतिरिक्त उनके कने कोई चारा भी नहीं था खुद को बचाने का। बाहर की चिल्ल-पौं और आरोप-प्रत्यारोप से कहीं बेहतर है जेल की बैरक। अंदर कम से कम ये मशहूर हस्तियां हर पल की सांस तो चैन से ले ही रही हैं।
चैन की सांस लेने अब हमारे पूर्व समाजवादी श्री अमर सिहंजी भी पहुंच गए हैं। उन्हें ऐसे शांतिपूर्ण माहौल की जरूरत भी थी। अभी हाल वे आपरेशन के कठिन दौर से गुजरकर चुके हैं। कुछ दिन तिहाड़ में रहेंगे, पुराने संगे-साथियों से मिले-जुलेंगे सब ठीक हो जाएंगे। हमारे ताईं वे और उनका स्वास्थ्य अति-महत्वपूर्ण है। धन्य हुई तिहाड़ उनको पाकर।
हम तो चाहते हैं कि ये मशहूर हस्तियां ऐसे ही तिहाड़ में बनी रहें। तिहाड़ की शोभा बढ़ाती रहें। साथ ही इनसे वे लोग भी सबक हासिल करें, जो इनके जैसे ही कामों में बाहर संलिप्त हैं। कभी पुलिस के हत्थे चढ़ गए, तो उनके वास्ते भी यही सबसे श्रेष्ठ जगह होगी।
क्या आपको नहीं लगता कि अन्ना की मुहिम का रंग धीरे-धीरे कर असर दिखाने लगा है।

भ्रष्टाचारियों पर नकेल कसनी है।

इधर दिल्ली में ब्लास्ट हुआ और उधर खामाखां ही इश्यू बन गया। यार इश्यू बनाने के लिए थोड़े ही न उन्होंने (आतंकवादियों) ब्लास्ट किया था। और फिर ब्लास्ट तो उन्होंने किया था, बुरा-भला उन्हें कहें, आप और विपक्ष मिलकर नाहक ही हमारी प्रगतिशील सरकार को कोस रहे हैं। यह कोई बात थोड़े न हुई यार!
क्या सरकार हर वक्त यही देखती रहे कि कहां ब्लास्ट हुआ, किसने किया, क्यों किया, किसलिए किया? ब्लास्ट में कहां कित्ते मरे गए और कित्ते हताहत हुए? सरकार के कने और भी कई जरूरी काम हैं। जनहित के वास्ते तमाम योजनाएं-परियोजनाएं बनाने को पैंडिंग पड़ी हैं। विकास दर को भी देखना है। अभी महंगाई को भी काबू में करना बाकी है। भ्रष्टाचारियों पर नकेल कसनी है। साथ ही अपना और मंत्रियों का घर भी देखना-भालना है। क्या जानते नहीं कि हमारी सरकार अभी-अभी एक बड़े ही जटिल आंदोलन से पार पाके चुकी है। जैसे-तैसे अन्ना जी को समझा-बुझाकर मामले को शांत करवाया है। और एक आप हैं कि सरकार से ब्लास्ट क्यों हुआ, कैसे हुआ जैसे गैर-जरूरी प्रश्न पूछने पर आमादा हैं। यह ठीक नहीं है।
यार, जब आपको सरकार बनना पड़ेगा न, तब पता चलेगा कि सरकार चलाना क्या होता है? सरकार को तमाम तरह के राजनीतिक दवाबों में रहकर काम करना पड़ता है। कभी इसकी सुन्नी पड़ती है, तो कभी उसकी। जिसके काम न आओ उसके बुरे। बंधु, सरकार होना कित्ते जिगरे का काम है, आपको क्या मालूम! आप तो बस...।
ठीक है.. ठीक है.. ब्लास्ट की धमक सरकार के कानों तक भी पहुंच चुकी है। अभी वो सारे माजरे को देख व समझ रही है। प्राथमिक स्तर पर जांच के आदेश दिए जा चुके हैं। सरकारी फरमान पर दिल्ली समेत हर राज्य, हर प्रदेश, हर शहर, हर गांव, हर गली-मोहल्ले तक में हाई-अलर्ट घोषित कर दिया गया है। सूंघने वाले कुत्तों को काम पर लगा दिया गया है। जगह-जगह के मेटल डिडक्टर और सीसीटीवी कैमरे पोंछे व ठीक किए जा रहे हैं। बसों-रेलों-हवाईजहाजों आदि-आदि को छाना जा रहा है। जिसे जहां जो भी संदिग्ध वस्तु या व्यक्ति नजर आवे झटसे पुलिस या सरकार को सूचित करें। यकीन करें एक्शन तुरंत होगा। हमारी हर वक्त मुस्तैद रहने वाली पुलिस हर कहीं लगी हुई है। निश्चिंत रहें कार्य प्रगति पर है।
कान खोलकर सुन लीजिए न सरकार न विपक्ष इस वक्त कोई भी चुप नहीं बैठा है। यह निंदा का समय है। सभी दल और मंत्रीगण अपनी-अपनी तरह और तरीके से ब्लास्ट की निंदा करने में व्यस्त हैं। जिसे जहां जगह मिल रही है, वहां जाकर अपनी निंदा को अभिव्यक्त कर रहा है। ब्लास्ट पर देशभक्तिपूर्ण बयानों का आना शुरू हो चुका है। किसी के निशाने पर सरकार है, तो किसी के गृहमंत्री। अंदरखाने इस-उस के इस्तीफों की आवाजें भी उठने लगी हैं। जनहित में कुछ नेता-मंत्री हस्पतालों के भी चक्कर काट आए हैं। राहुल बाबा भी गए थे पर उन्हें मायूसी में वहां से रूखस्त होना पड़ा। मतलब कि ब्लास्ट पर सरकार, विपक्ष और नेताओं के बीच कुछ न कुछ चल जरूर रहा है।
प्रधानमंत्री जी ने साफ कह दिया है कि चाहे जो हो जाए पर घुटने नहीं टेकेंगे। सख्त से सख्त कार्रवाई का भरोसा उन्होंने जताया है। अब आपको चाहिए कि आप उनके भरोसे पर भरोसा रखें क्योंकि यही वक्त की मांग है। अपनी अक्ल न दौड़ाएं, दौड़ने के लिए सरकार और प्रशासन के कने तमाम लोग हैं। हां दिल बहलाने को थोड़ी-बहुत भर्त्सना चलेगी।
सरकार हमारी भली है। प्रगतिशील है। सब मैनेज कर लेगी। इत्ते सालों से कैसे कर रही है आपको पता ही है। सरकार को अधिक डिस्टर्ब न करें। अन्य कामों के साथ-साथ वो ब्लास्ट और ब्लास्ट करने वालों को भी देख लेगी। मालूम होगा कि सरकार ने मुआवजे का ऐलान कर ही दिया है। सरकार के ताईं मुआवजा राशि ही हर मर्ज और दर्द का इलाज है शायद!
बहरहाल, आप जनता से गुजारिश है कि चुप रहें। क्योंकि जब जनता बोलती है तो सरकारों को बुरा लगता है। जैसाकि अभी भ्रष्टाचार के मसले पर लगा था। ऐसा ही अक्सर उसे कसाब और अफजल गुरु के मसले पर भी लग जाता है। 
लेकिन एक डर मेरे मन में उठने-सा लगा है कि कहीं भ्रष्टाचार के मुद्दे की तरह अब आतंकवाद को लेकर कोई दूसरा अन्ना कहीं धरने या अनशन पर न बैठ जाए। सरकार को इस डर को समझना चाहिए।

हिंदी-अंग्रेजी का मिक्चर हमारी भाषा को खराब कर रहा है।

आज हिंदी दिवस है। यानी हिंदी को याद करने का एक दिन। हिंदी दिवस को केवल अपने मोहल्ले में ही नहीं बल्कि पूरे देश के हर मोहल्ले के कोने-कोने में खूब जोर-शोर के साथ सैलिब्रेट किया जाता है। सैलिब्रेट किया भी जाना चाहिए क्योंकि हमारी लाइफ हिंदी के बिना इनकंपलीट-सी है। लाइफ को अगर कंपलीट करना या बनाना है, तो जितना और जहां तक हो सके हम-आप हिंदी में ही कनवरसेशन करें। जैसे कि आज इस मंच से मैं आपसे कर रहा हूं।
यह तो आप बचपन से ही जानते हैं कि हिंदी हमारी मदरटंग है। चूंकि इसमें मदर शब्द जुड़ा है, इस नाते हिंदी की हर प्रकार से रिसपेक्ट करना हमारी ड्यूटी बनती है। बट मैं देख रहा हूं हम अब हिंदी के प्रति इनडिफरेंट-सा रूख अपनाते जा रहे हैं। हम बोल तो हिंदी ही रहे हैं बट उसमें जरूरत से ज्यादा इंग्लिश के बडर्स इस्तेमाल कर हमने अपनी मदरटंग को हिंग्लिश बना दिया है। दिस इज बेरी बेड। यह हिंदी लैंग्विज का सीधा-सीधा अपमान है।
मुझे यह बताते हुए बड़ी सेडनेस फील हो रही है कि हमारी हिंदी आज डेनजरजोर में है। और, हिंदी के प्रति यह खतरा निरंतर बढ़ता ही जा रहा है। हिंदी को सबसे ज्यादा खतरा ग्लोबल ताकतों से है। मार्केट हिंदी को बेहद अफेक्ट कर रहा है। मार्केट ने हिंदी की वेल्यूज को ही नष्ट कर दिया है। हम हिंदी का कल्चर भूलते जा रहे हैं। आज जब मैं युवा पीढ़ी को आपस में हिंग्लिश में स्पीस करते हुए देखता व सुनता हूं, तो मेरा कलेजा मुंह को आ जाता है। मेरे फोरहेड पर चिंता की लकीरें उभरने लगती हैं। बार-बार खुद से कोशचन करता हूं कि हमारी यंगर जनरेशन को यह क्या होता जा रहा है! बैड थिंकिंग।
बताइए आज नाइनटी परसेंट युवा एसएमएस की लैंग्विज में ही बात करना पसंद करते हैं। हिंदी को भी बेहद शार्ट करके लिखते हैं। हिंदी-अंग्रेजी का मिक्चर हमारी भाषा को खराब कर रहा है। और, यह सब अमेरिकी कल्चर के कारण ही है। हमारे भीतर अमेरिकी कल्चर इस कदर बस गया है हम उससे बाहर आना ही नहीं चाहते। मुझे यह कहते हुए कतई फियर नहीं कि हमारी हिंदी को अमेरिकी कल्चर ही बिगाड़ रहा है। यह अमेरिका की सोची-समझी चाल है। इंडियन गवरमेंट को इस बारे में कुछ न कुछ सोचने व करने की जरूरत है।
सोने पर सुहागा ये कि मुई फेसबुक और अदर सोशल नेटवर्किंग साइटस भी हिंदी लैंग्विज को नुकसान पहुंचा रही हैं। आई डोंट नो लोग कैसे कह रहे हैं कि सोशल नेटवर्किंग के कारण हिंदी का स्पेस बढ़ रहा है, बट मुझे यह तर्क अटपटा-सा लगता है। अरे, फेसबुक की भी कोई भाषा है। मजा तो हमारी ओल्ड लैंग्विज में ही था। इत्ती पियोर की पियोरनेस भी शरमा जाए। पर क्या करें हम तो अंधी दौड़ में भागे ही चले जा रहे हैं। दस इज डेंजरस फॉर आवर हिंडी लैंग्विज।
यू नो आजकल की हिंदी फिल्में भी हिंदी का कबाड़ा कर रही हैं। बताइए देल्ही-बेली (धीमी-सी आह भरते हुए) जैसी अश्लील फिल्म को प्रोग्रेसिव फिल्म की कैटीगिरी में रखा जा रहा है। ऊपर से उसकी स्लंग-लैंग्विज...हम ऐसी फिल्मों को अपनी फैमली के साथ बैठकर नहीं देख सकते। अभी हाल मैंने डर्टी पिक्चर के प्रोमो को देखा। उफ्फ! मुझसे वो सबकुछ फैमली के साथ देखा नहीं गया। कित्ता गलत वातावरण बना रही हैं ये फिल्में हमारे आसपास। मैं पूरजोर आवाज में यह कहना चाहता हूं कि ऐसी फिल्में और भाषा हमारी मदरटंग के प्रति अपमान सरीखी हैं। हमें इसके खिलाफ प्रोटेस्ट करना चाहिए। अन्ना जी से इसके रिगार्डिंग बता करता हूं।
वैल, मेरे कने अभी कहने को बहुत कुछ है। बट टाइम की शार्टनेस है। अभी एक जगह और हिंदी के प्रोग्राम को सैलिब्रेट करने जाना है। बट हममें से प्रत्येक आज इस मंच से यह ओथ ले कि हम अपनी मदरटंग का अपमान नहीं सहेंगे, नहीं सहेंगे। ग्लोबल पावर का हर हाल में विरोध करेंगे। हिंदी को उसका लॉस्ट हुआ कल्चर, वैल्यूज और डिगनिटी सब वापस लाकर देंगे।

आतंकवाद और भ्रष्टाचार सरकार की नाक का नासूर बन गए हैं।

यह निंदा का समय है। यहां-वहां से किस्म-किस्म की निंदाएं सुनने में भी आ रही हैं। कोई धमाके की निंदा में व्यस्त है, तो कोई सरकार की। निंदा की आड़ पाकर विपक्ष के कने सुनहरा मौका हाथ आया है, अपनी राजनीतिक रोटियां सेकने का। सरकार को बतलाने का कि जब हम थे तो ऐसा नहीं होता था, लेकिन जबसे आप आएं हैं ऐसा होता ही रहता है। क्यों? बेचारी सरकार गफलत में है कि करे भी तो क्या? मगर अफसोस सरकार की मजबूरियों को कोई समझने की कोशिश ही नहीं करना चाहता। यहां तो सभी निंदारस का लुत्फ लेने और देने में लगे हैं।
वाकई आतंकवाद और भ्रष्टाचार सरकार की नाक का नासूर बन गए हैं। शायद यही वजह है कि सरकार ने निंदाओं पर अधिक ध्यान देना ही बंद कर दिया है। उसकी बला से जिसके मन में जो आए वैसी निंदा करे। सरकार को निंदा सहने की आदत-सी हो गई है शायद। क्या करें ऐसी घोर निंदाओं के बीच जिसे निंदा न सहने की आदत हो वो भी इसे सहन करना सीख जाएगा। वक्त अपने हिसाब से हमें सबकुछ सीखा देता है।
बतलाने की आवश्यकता नहीं कि निंदा करना हमारा 'लोकतांत्रिक अधिकार' है। निंदा करने का बस बहाना हमारे हत्थे आना चाहिए फिर देखिए हम क्या से क्या नहीं कह-बोल जाते हैं।
अब देखिए न। धमाका दिल्ली में हुआ, धमाका करने वाले भी कोई और थे, पर निंदा खामाखां ही बेचारी सरकार और नेताओं की हो रही है! समूचा विपक्ष गा रहा है कि यह सरकार धमाके और हमलों को रोकने में नाकाम साबित हुई है। इसे इस्तीफा दे देना चाहिए। जरा-जरा-सी बात पर तो इस्तीफा मांगने लग जाते हैं वे। सरकार ने भी माना है कि चूक हुई है पर इसका हल इस्तीफा थोड़े है। बेहद गंभीरता से सरकार इस मसले को देख-समझ रही है। प्रधानमंत्री जी ने भी धमाके को कायरतापूर्ण कदम बताया है। दहशतगर्दों को न बख्शने का आश्वासन भी दिया है। फिर भी आप सरकार के इकबाल को तोड़ने पर जुटे हैं। सरकार को वक्त दीजिए। एक दिन वो दूध का दूध और पानी का पानी करके दिखा देगी।
यूं निंदा से कुछ हासिल नहीं। निंदा कर अपना खून न जलाइए। आप ही सुरक्षित रहने की कोशिश कीजिए। जब जरूरी हो तब ही घर से बाहर निकलिए। और जब निकलिए अपना बीमा करवाकर निकलिए। क्योंकि अपने यहां धमाकों का कोई भरोसा नहीं कहीं भी हो जाते हैं। बस यह न भूलिए कि सरकार का हाथ हमेशा आम आदमी के साथ है। उसे सहयोग कीजिए और करते रहिए। पर निंदा न कीजिए...क्योंकि सरकार को निंदा सुनना अच्छा नहीं लगता।